संसद ने गुरुवार को माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को अपनी मंजूरी दे दी है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य मिनरल राइट्स और खनिज समृद्ध जमीनों पर टैक्स लगाने के राज्यों के अधिकारों को सीमित करना और खनिज की दरों में राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता लाना है। केंद्र सरकार का कहना है कि इस नए कानून का मकसद राज्यों की स्वायत्तता में दखल देना बिल्कुल नहीं है। संसद में पारित होने के तुरंत बाद इस विधेयक पर केरल और झारखंड जैसे राज्यों की ओर से कड़ा विरोध देखने को मिला है।
संसदीय कार्यवाही के दौरान लोकसभा ने बुधवार को और राज्यसभा ने गुरुवार को इस बिल को पारित किया। चर्चा के दौरान कांग्रेस का कोई भी सांसद शामिल नहीं हुआ, जबकि डीएमके, बीजू जनता दल, राजद और वामदलों समेत अन्य विपक्षी दलों ने सवाल उठाए कि क्या इस कानून से राज्य सरकारों के राजस्व पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
विपक्ष के सवालों और आशंकाओं का जवाब देते हुए केंद्रीय खान मंत्री जी किशन रेड्डी ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार केवल कोयला, चूना पत्थर, लौह अयस्क, तांबा और मैंगनीज जैसे प्रमुख खनिजों को रेगुलेट करना चाहती है, जबकि 49 गौण खनिजों (माइनर मिनरल्स) पर राज्यों का पूर्ण अधिकार पहले की तरह बना रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि खनिज राजस्व का केवल 11 प्रतिशत केंद्र के पास जाता है, जबकि 88 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को मिलता है। उन्होंने भरोसा दिया कि किसी भी राज्य को राजस्व का नुकसान नहीं होगा।
पूर्ववर्ती सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि यूपीए कार्यकाल के दौरान आवंटित कोयला ब्लॉक एक घोटाला थे, जबकि पिछले 12 वर्षों में खनिजों का आवंटन पूरी तरह पारदर्शी रहा है। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि खनिज राजस्व में राज्यों का हिस्सा 2014-15 के 65 प्रतिशत से बढ़कर अब 85 प्रतिशत हो गया है, वहीं कोयला राजस्व में उनका हिस्सा 51 प्रतिशत से बढ़कर 96 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
दूसरी ओर, इस कानून के पारित होने पर राज्य सरकारों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस कानून के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन की घोषणा करते हुए चेतावनी दी है कि यदि केंद्र ने इसे वापस नहीं लिया तो पूरा देश इसके परिणामों को देखेगा। वहीं केरल के नेता प्रतिपक्ष वीडी सतीशन ने भी अपनी सरकार की ओर से इस कानून का पुरजोर विरोध करने की बात कही है। उनका आरोप है कि ये प्रस्तावित बदलाव जमीनों पर राज्यों के संवैधानिक और भौगोलिक अधिकारों का सीधा अतिक्रमण करते हैं।
