कावेरी जल विवाद पर भड़की सियासत, तमिलनाडु के मंत्री बोले- स्टालिन का कहना मानते हैं डीके शिवकुमार

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) द्वारा कर्नाटक के साथ सीधे बातचीत की पहल टलने के बाद, तमिलनाडु सरकार के वरिष्ठ मंत्री आर. निर्मल कुमार ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पर बड़ा हमला बोला है।

कावेरी जल विवाद पर भड़की सियासत
कावेरी जल विवाद पर भड़की सियासत

चेन्नई: कावेरी जल विवाद को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच सियासी तनातनी एक बार फिर तेज हो गई है। दोनों राज्यों के बीच बातचीत की संभावनाओं को झटका लगा है। तमिलनाडु सरकार के वरिष्ठ मंत्री आर. निर्मल कुमार ने कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि वे कांग्रेस नेतृत्व से ज्यादा डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन की बात मानते हैं।

रविवार को मीडिया से बातचीत में निर्मल कुमार ने दावा किया कि डीके शिवकुमार के फैसलों पर स्टालिन का प्रभाव साफ दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि अगर स्टालिन या उनके परिवार की ओर से कोई सुझाव दिया जाता है, तो शिवकुमार उसे तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। मंत्री ने दोनों नेताओं के बीच करीबी रिश्तों का भी जिक्र किया।

निर्मल कुमार को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय का करीबी माना जाता है। ऐसे में उनके बयान को सरकार के रुख के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि तमिलनाडु सरकार अब कावेरी विवाद के समाधान के लिए केवल बातचीत पर भरोसा नहीं करना चाहती और कानूनी प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ने के पक्ष में है।

दरअसल, पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री विजय ने कावेरी विवाद पर कर्नाटक नेतृत्व से बातचीत की पहल की थी। लेकिन कर्नाटक में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के आदेशों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद प्रस्तावित बैठक टाल दी गई। इसके बाद दोनों राज्यों के बीच संवाद की संभावना फिलहाल कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।

तमिलनाडु के मंत्री ने विपक्षी दलों डीएमके और एआईएडीएमके पर भी निशाना साधा। उन्होंने सवाल उठाया कि डीएमके ने अपने कार्यकाल के दौरान कावेरी मुद्दे पर प्रभावी कानूनी कदम क्यों नहीं उठाए। वहीं एआईएडीएमके से पूछा कि विधानसभा में प्रस्ताव का समर्थन करने के बाद अदालत में उसका विरोध क्यों किया गया।

कावेरी जल विवाद के पीछे इस साल कम बारिश भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। कर्नाटक का कहना है कि जलाशयों में पानी कम होने के कारण तय मात्रा में पानी छोड़ना मुश्किल हो रहा है। वहीं मेकेदातू बांध परियोजना को लेकर भी दोनों राज्यों के बीच मतभेद बने हुए हैं। कर्नाटक का कहना है कि यह परियोजना बेंगलुरु की पेयजल जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगी, जबकि तमिलनाडु का दावा है कि इससे राज्य के डेल्टा क्षेत्र में पानी का प्रवाह प्रभावित होगा और किसानों पर इसका असर पड़ेगा।

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