सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से जुड़े मुकदमों की सुनवाई के दौरान न्यायिक संवेदनशीलता बनाए रखने के लिए तैयार की गई नेशनल गाइडलाइंस को अपनी अंतिम मंजूरी दे दी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ ने देश की सभी अदालतों को कड़े निर्देश जारी किए हैं कि वे इस मंजूर की गई हैंडबुक में दिए गए दिशा-निर्देशों का हर हाल में सख्ती से पालन सुनिश्चित करें। मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की एक्सपर्ट कमेटी ने इस संवेदनशील विषय पर बहुत ही शानदार काम किया है।
इस महत्वपूर्ण फैसले के तहत सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने आदेश दिया है कि इन स्वीकृत गाइडलाइंस या हैंडबुक को सुप्रीम कोर्ट सहित देश के सभी हाई कोर्ट और जिला अदालतों की आधिकारिक वेबसाइटों पर तुरंत अपलोड किया जाए। इसके अलावा, कानूनी जागरूकता और प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के लिए इन दिशा-निर्देशों को नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, सभी राज्यों की न्यायिक अकादमियों, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज और विभिन्न विश्वविद्यालयों के लॉ डिपार्टमेंट्स में भी अनिवार्य रूप से वितरित किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि इस स्वीकृत हैंडबुक को भविष्य में एक औपचारिक न्यायिक आदेश का हिस्सा बनाया जाएगा ताकि इसका कानूनी महत्व और मजबूत हो सके।
सर्वोच्च अदालत ने इस संवेदनशीलता को केवल कोर्ट रूम तक सीमित न रखकर शुरुआती जांच के स्तर पर भी लागू करने की बात कही है। आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सभी राज्यों के डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन और डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (डीजीपी) अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के सभी थानों को यह जरूरी निर्देश जारी करें कि एफआईआर (FIR) दर्ज करते समय या अदालत में चार्जशीट दायर करते समय इस हैंडबुक में बताई गई मर्यादाओं और बातों का कड़ाई से पालन किया जाए। इस पूरी गाइडलाइन की विस्तृत और बारीक जानकारी इसके आधिकारिक तौर पर अपलोड होने के बाद पूरी तरह सामने आएगी।
इस राष्ट्रीय गाइडलाइन को तैयार करने की पृष्ठभूमि वास्तव में 17 मार्च 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दिए गए एक विवादित फैसले से जुड़ी हुई है, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए इस मामले को आगे बढ़ाया था। दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उस दौरान एक टिप्पणी में कहा था कि किसी लड़की के पजामे का नाड़ा खोलना और उसके ब्रेस्ट को पकड़ना दुष्कर्म (रेप) के प्रयास के दायरे में शामिल नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पीठ को अवगत कराया कि इस तरह की संवेदनहीन टिप्पणियां और आदेश अब अदालतों में आए दिन देखने को मिल रहे हैं, जिसके उदाहरण के रूप में उन्होंने 9 जुलाई को आए पटना हाई कोर्ट के एक ताजा फैसले का भी जिक्र किया।
पटना हाई कोर्ट के उस फैसले का हवाला देते हुए बताया गया कि वहां भी एक अदालत ने यौन अपराध के मामले की व्याख्या करते हुए टिप्पणी की थी कि महिला का सलवार खोलना और उसकी छाती को दबाना रेप की कोशिश के तहत नहीं आता है। पटना हाई कोर्ट की इस तरह की टिप्पणी पर सीजेआई सूर्यकांत ने गहरी नाराजगी और असंतोष व्यक्त किया। मुख्य न्यायाधीश ने जजों की जिम्मेदारी को याद दिलाते हुए तल्ख लहजे में कहा कि न्यायाधीशों का यह कर्तव्य है कि वे फैसलों पर पहुंचने से पहले कुछ कानूनी रिसर्च और अध्ययन भी करें, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के मामलों में स्टाफ कुछ भी काम नहीं कर रहा है।
गौरतलब है कि पटना हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने अपने फैसले में आरोपी को रेप की कोशिश के गंभीर आरोपों से पूरी तरह मुक्त कर दिया था। उन्होंने तर्क दिया था कि यदि किसी व्यक्ति ने महिला का सलवार खोला और उसकी छाती दबाई, तो इस कृत्य को कानूनन केवल महिला की मर्यादा भंग करने (आउटरेजिंग ऑफ मॉडस्टी) के अपराध के दायरे में ही रखा जाएगा, न कि रेप की कोशिश के तहत, जिसमें कि कहीं ज्यादा सख्त और लंबी सजा का कानूनी प्रावधान है। उच्च न्यायालयों द्वारा आरोपियों को इस तरह की बड़ी राहत देने और संवेदनहीन व्याख्या करने के बढ़ते चलन को रोकने के लिए ही अब सुप्रीम कोर्ट ने इस राष्ट्रीय हैंडबुक को पूरे देश में अनिवार्य कर दिया है।
