नई दिल्ली: नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली दंगों के दौरान देश को झकझोर देने वाले इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) अधिकारी अंकित शर्मा हत्याकांड में कड़कड़डूमा कोर्ट ने करीब साढ़े छह साल बाद ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पूर्व आम आदमी पार्टी (AAP) पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच आरोपियों को अंकित शर्मा की हत्या, दंगा भड़काने, अपहरण और विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने जैसी संगीन धाराओं में दोषी ठहराया है। कोर्ट ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि भीड़ की हिंसा में शामिल हर व्यक्ति उसके सामूहिक अपराधों के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना जाएगा। हालांकि, अदालत ने ताहिर हुसैन को आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) के आरोप से बरी कर दिया है।
51 घाव और चेहरे पर फेंका गया था एसिड
अंकित शर्मा के पिता रविंदर कुमार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, 25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों के दौरान 26 वर्षीय अंकित घर से बाहर निकले थे, लेकिन वापस नहीं लौटे। अगले दिन उनका क्षत-विक्षत शव चांद बाग पुलिया के पास खजूरी खास नाले से बरामद हुआ था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यह भयावह खुलासा हुआ था कि अंकित के शरीर पर धारदार और कुंद हथियारों से किए गए 51 गहरे घाव थे। अदालत ने सुनवाई के दौरान माना कि उनकी पहचान छिपाने के उद्देश्य से उनके चेहरे और शरीर पर तेजाब (एसिड) भी डाला गया था। कोर्ट ने पहले दिए गए अपने एक आदेश में यह भी रेखांकित किया था कि दंगों के समय ताहिर हुसैन की इमारत हिंसक भीड़ के संचालन केंद्र (कंट्रोल रूम) के रूप में काम कर रही थी।
11 में से 5 आरोपी दोषी, 6 साक्ष्यों के अभाव में बरी
इस बहुचर्चित हत्याकांड में पुलिस ने कुल 11 लोगों को आरोपी बनाया था, जिनमें से अदालत ने पांच को दोषी करार दिया और छह को मुख्य आरोपों से बरी कर दिया है। दोषी ठहराए गए लोगों में पूर्व आप पार्षद ताहिर हुसैन, नाजिम, कासिम, जावेद और अनस शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर, हसीन उर्फ मुल्लाजी, समीर खान, फिरोज, गुलफाम, शोएब आलम उर्फ बॉबी और मुंतजिम उर्फ मूसा को अदालत ने पुख्ता सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया। ताहिर हुसैन के वकील ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि छह आरोपियों का बरी होना यह साबित करता है कि कोर्ट ने सबूतों का स्वतंत्र मूल्यांकन किया है, लेकिन वे ताहिर की दोषसिद्धि से निराश हैं और इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देंगे।
जांच टीम की पेशेवर मेहनत पर लगी न्यायिक मुहर
अदालत के इस फैसले का दिल्ली पुलिस के शीर्ष अधिकारियों ने स्वागत किया है। तत्कालीन स्पेशल सीपी और वर्तमान पुलिस कमिश्नर सतीश गोलछा ने कहा कि दंगों के चुनौतीपूर्ण समय में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ निष्पक्ष और साक्ष्य आधारित जांच करना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। इस फैसले ने जांच टीम की प्रफेशनल अप्रोच को न्यायिक रूप से सही साबित किया है। स्पेशल सीपी (क्राइम) एचजीएस धालीवाल ने भी इस बात की सराहना की कि क्राइम ब्रांच की गहन और वैज्ञानिक जांच के कारण ही वे कोर्ट के समक्ष आरोपियों के खिलाफ एक बेहद मजबूत केस पेश करने में सफल रहे।
सांप्रदायिक हिंसा में कोई नहीं जीतता: सरकारी वकील
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर मधुकर पांडे ने बेहद संवेदनशील और व्यावहारिक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस फैसले को अभियोजन पक्ष की किसी पारंपरिक ‘जीत’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने दर्द बयां करते हुए कहा कि सांप्रदायिक हिंसा का सबसे बड़ा और स्थाई नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है; इस मामले में जहां एक परिवार ने अपने युवा बेटे को खो दिया, वहीं अब दोषी ठहराए गए लोगों के परिवार भी जीवनभर के कठिन दौर से गुजरेंगे। उन्होंने साफ किया कि यह फैसला पूरी तरह से एक निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें केवल कानून की जीत हुई है।
