अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मंदिर के प्रबंधन को अधिक पारदर्शी, व्यवस्थित और पेशेवर बनाने के लिए साल 2020 में अपने गठन के बाद से अब तक का सबसे बड़ा फेरबदल किया है। हाल ही में राम मंदिर में दान राशि की कथित चोरी के आरोपों के बाद बने असाधारण हालातों को देखते हुए 11 जुलाई को होने वाली बैठक सोमवार को ही बुलाई गई। तीन घंटे से अधिक समय तक चली इस हाई-प्रोफाइल बैठक में कई ऐतिहासिक और कड़े संगठनात्मक निर्णय लिए गए, जिससे देश के सियासी और धार्मिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
इस महत्वपूर्ण बैठक में ट्रस्ट ने पहली बार मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) का पद सृजित करने का एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला किया है। मंदिर में श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती संख्या और परिसर के दैनिक संचालन व व्यवस्थाओं को पेशेवर प्रशासनिक तरीके से संभालने के लिए एक तीन सदस्यीय चयन समिति का गठन किया गया है। इस समिति में सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस प्रमोद कोहली, पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल विष्णु कांत चतुर्वेदी और सुरेश हवारे शामिल हैं, जो जल्द ही इस शीर्ष पद के लिए उपयुक्त और योग्य नामों की सिफारिश ट्रस्ट को सौंपेंगे।
इसके साथ ही, संगठनात्मक स्तर पर बड़ा बदलाव करते हुए ट्रस्ट ने महासचिव चंपत राय और सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिए हैं। गौरतलब है कि इन दोनों पदाधिकारियों ने दान राशि की चोरी के मामले में 25 जून को प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए स्वेच्छा से अपना इस्तीफा सौंप दिया था। बैठक में वर्चुअली शामिल हुए ट्रस्ट के संस्थापक सदस्य 99 वर्षीय के. परासरण ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट के संविधान के अनुसार, किसी भी सदस्य का इस्तीफा सौंपते ही प्रभावी हो जाता है, इसलिए ट्रस्ट के पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था। इस फेरबदल के तहत ट्रस्ट ने वरिष्ठ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पदाधिकारी और सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा (IFoS) अधिकारी कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव नियुक्त किया है और उन्हें अपनी नई टीम चुनने की पूरी स्वतंत्रता दी है। इसके अलावा, विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची से गोपाल नागरकट्टे उर्फ गोपाल राव को भी हटा दिया गया है।
नवनियुक्त अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन उत्तर प्रदेश के हरदोई के रहने वाले हैं और वे महाराष्ट्र कैडर के IFoS अधिकारी के रूप में अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। पदभार संभालते ही उन्होंने अपनी साफ-सुथरी छवि और प्रशासनिक अनुभव का परिचय देते हुए स्वीकार किया कि ट्रस्ट की आंतरिक व्यवस्था में कुछ कमियां थीं, जिनकी वजह से यह कथित गड़बड़ी हुई। उन्होंने कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता इन सभी खामियों को दूर कर श्रद्धालुओं का भरोसा फिर से जीतना है। वहीं ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरी ने इस घटना पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि 500 वर्षों के संघर्ष और बलिदानों के बाद बने भव्य मंदिर में चोरी होना बेहद शर्मनाक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चिंता चोरी की रकम की नहीं, बल्कि भक्तों की भावनाओं और ट्रस्ट की साख को पहुंचे नुकसान की है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग इस विवाद की आड़ में राम मंदिर आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ट्रस्ट दान की हर वस्तु का पूरा रिकॉर्ड रखता है और इसे और अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा।
आर्थिक पारदर्शिता की दिशा में कदम बढ़ाते हुए ट्रस्ट ने मंदिर की स्थापना से लेकर अब तक मिले दान और खर्च का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, निधि समर्पण अभियान और अन्य माध्यमों से ट्रस्ट को अब तक कुल 3246 करोड़ रुपये का दान मिला है, जिसमें से 2370 करोड़ रुपये मंदिर निर्माण और पूंजीगत कार्यों पर खर्च हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, 31 मार्च 2026 तक श्रद्धालुओं से 582 करोड़ रुपये का चढ़ावा प्राप्त हुआ, जिसमें से 319 करोड़ रुपये दैनिक संचालन व व्यवस्थाओं पर खर्च किए गए और शेष राशि बैंक खातों में सुरक्षित रखी गई है।
राम मंदिर दान चोरी मामले में अब तक आठ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और विशेष जांच टीम (SIT) इस मामले की गहराई से तफ्तीश कर रही है। ट्रस्ट की अगली महत्वपूर्ण बैठक 22 जुलाई को निर्धारित की गई है, तब तक SIT द्वारा अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपे जाने की पूरी उम्मीद है। उस बैठक में चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे तथा पिछले वर्ष विमलेंद्र प्रताप मिश्रा के निधन के कारण खाली हुए ट्रस्ट के तीन रिक्त पदों को भरने पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। इस घटना ने देश भर के अनुमानित 8-10 लाख मंदिरों के प्रबंधन पर एक नई राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है, जिनमें से करीब 4 लाख मंदिर सरकारी धार्मिक कानूनों और भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के तहत प्रबंधित होते हैं और जिनकी अनुमानित संपत्ति 9 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
