‘4 वरिष्ठ वकील माहौल खराब कर रहे हैं, उंगली उठाई तो भुगतेंगे नतीजे!’ सुप्रीम कोर्ट में पूर्व जज के केस पर भड़के CJI सूर्यकांत

सुप्रीम कोर्ट में एक अनोखे मामले की सुनवाई के दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अहम टिप्पणी की है। पूर्व सिविल जज अमरीश कुमार जैन की सेवा समाप्ति से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए CJI ने कहा कि कुछ तथाकथित वरिष्ठ वकील माहौल खराब कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद अनोखे और गंभीर मामले की सुनवाई के दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने न्यायपालिका की शुचिता को लेकर एक बेहद सख्त टिप्पणी की है। मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि तीन से चार तथाकथित सीनियर वकील न्यायिक माहौल को खराब करने का प्रयास कर रहे हैं और वे खुद ऐसे मामलों पर बहुत करीबी नजर रखे हुए हैं। यह पूरा मामला पंजाब के एक पूर्व सिविल जज से जुड़ा हुआ है, जिसकी याचिका पर सुनवाई करने से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की चार अलग-अलग बेंच खुद को अलग (Recuse) कर चुकी हैं। हाईकोर्ट के जजों द्वारा बार-बार खुद को सुनवाई से अलग किए जाने के बाद अब यह मामला देश की शीर्ष अदालत पहुंचा था।

सुप्रीम कोर्ट का हाईकोर्ट को तत्काल विशेष खंडपीठ गठित करने का निर्देश

पूर्व सिविल जज अमरीश कुमार जैन की सेवा समाप्ति से जुड़े इस संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप किया है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बुधवार को सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे मामले की सुनवाई के लिए तत्काल दो जजों की एक नई खंडपीठ (डिवीजन बेंच) का गठन करें। शीर्ष अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि इस मामले की सुनवाई में अब और किसी भी प्रकार की देरी नहीं होनी चाहिए। संबंधित जजों को यह स्पष्ट तौर पर सलाह दी जाए कि वे किसी भी परिस्थिति में अब खुद को इस केस की सुनवाई से अलग नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि मामले की सुनवाई प्रतिदिन (डे-टू-डे) के आधार पर की जाए और 13 जुलाई 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में इस पर अंतिम फैसला सुनाया जाए। साथ ही, फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को इसकी एक अनुपालन रिपोर्ट सर्वोच्च अदालत में प्रस्तुत करनी होगी।

पूर्व सिविल जज ने कोर्ट को बताई जजों के हटने की कहानी

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अमरीश कुमार जैन अपने वकील अभय प्रताप सिंह के साथ अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। जब सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने उनसे उन जजों के नाम पूछे जिन्होंने इस मामले से दूरी बनाई थी, तो जैन ने सिलसिलेवार ढंग से पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सबसे पहले जस्टिस लिसा गिल ने खुद को इस मामले से अलग किया था। इसके बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस ने इस केस की सुनवाई पूरी कर फैसला छह महीने तक सुरक्षित रखा, लेकिन बाद में उन्होंने भी मामले से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और फिर जस्टिस दीपक सिब्बल की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। पूर्व जज ने भावुक होते हुए कोर्ट को यह भी बताया कि उन्होंने वर्ष 2024 में अपने पेंशन संबंधी लाभों को जारी करने के लिए आवेदन दिया था ताकि वह अपने बेटे की एलएलबी अंतिम वर्ष की फीस जमा कर सकें, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर उनकी यह जायज मांग भी स्वीकार नहीं की गई।

‘शरारत की तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम’ – CJI की चेतावनी

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि वे इस पूरे मामले की स्वयं निगरानी करेंगे। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधान न्यायाधीश ने इस बात के संकेत दिए कि कुछ वरिष्ठ वकील जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं जिससे जज बार-बार खुद को मामले से अलग करने पर मजबूर हो रहे हैं। सीजेआई ने अमरीश कुमार जैन को सलाह दी कि वे किसी वरिष्ठ वकील के चक्कर में पड़ने के बजाय आगे से अपना पक्ष स्वयं (इन-पर्सन) अदालत के सामने रखें। इसके साथ ही कोर्ट ने जैन को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उनकी तरफ से किसी भी प्रकार की अनुचित गतिविधि या न्यायिक प्रक्रिया के साथ शरारत करने की कोशिश की गई, तो इसके बेहद गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। शीर्ष अदालत ने भरोसा दिया कि इस मामले का पूरी तरह निष्पक्ष और समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित किया जाएगा, जिस पर जैन ने कहा कि वे पहले भी दो पीठों के सामने खुद बहस कर चुके हैं और आगे भी अपनी पैरवी खुद करने के लिए तैयार हैं।

दो दशक पुराना है यह पूरा कानूनी विवाद

अमरीश कुमार जैन के इस मामले का इतिहास करीब दो दशक पुराना है। उन्होंने नवंबर 2005 में पंजाब ज्यूडिशियल सर्विसेज परीक्षा पास कर सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में अपनी न्यायिक सेवा शुरू की थी। हालांकि, महज चार साल बाद वर्ष 2009 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति की सिफारिशों के आधार पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। जैन ने इस टर्मिनेशन को अदालत में चुनौती दी और आरोप लगाया कि वर्ष 2007 में जालंधर के तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश उनके प्रति व्यक्तिगत पूर्वाग्रह रखते थे, जिसके कारण उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में जानबूझकर प्रतिकूल और खराब टिप्पणियां दर्ज की गईं।

एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद, अक्टूबर 2018 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अमरीश जैन के पक्ष में एक बड़ा फैसला सुनाया और उन्हें पूरी वरिष्ठता, सेवा की निरंतरता, वेतनवृद्धि और प्रमोशन जैसे सभी कूटनीतिक व सेवा लाभों के साथ दोबारा बहाल करने का आदेश दिया, हालांकि उन्हें बकाया वेतन देने से मना कर दिया गया था।

बहाली के बाद दोबारा सेवा समाप्ति से उलझा मामला

हाईकोर्ट के इस फैसले को जनवरी 2019 में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने भी पूरी तरह बरकरार रखा था, जिसके बाद मार्च 2019 में जैन को आधिकारिक तौर पर नौकरी पर वापस ले लिया गया। लेकिन यह विवाद तब दोबारा उलझ गया जब मार्च 2022 में हाईकोर्ट ने प्रशासनिक पक्ष से एक बार फिर उनकी सेवा समाप्त करने की सिफारिश कर दी और 18 अप्रैल 2022 को उन्हें दूसरी बार पद से हटा दिया गया।

अमरीश कुमार जैन का तर्क है कि इस दोबारा की गई कार्रवाई से न केवल उनकी आजीविका छिन गई, बल्कि वे अपनी पुरानी सेवा के एवज में मिलने वाले पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से भी पूरी तरह वंचित कर दिए गए हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद, इस पूरे विवाद की नए सिरे से रोजाना के आधार पर सुनवाई हाईकोर्ट की एक विशेष पीठ करेगी, जिसकी सीधी निगरानी देश की शीर्ष अदालत के हाथों में होगी।

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