नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया में ऊर्जा का संकट पैदा कर दिया है, जिसके चलते वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस नाजुक समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 से 20 मई तक यूएई और यूरोप के पांच देशों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण यात्रा पर जा रहे हैं। प्रधानमंत्री की इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत की ऊर्जा सुरक्षा को पुख्ता करना और व्यापारिक रिश्तों को नई दिशा देना है। अपनी इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली के शीर्ष नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे और कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री के दौरे का पहला पड़ाव संयुक्त अरब अमीरात होगा, जहाँ वे 15 मई को राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात करेंगे। यूएई भारत का एक प्रमुख ऊर्जा भागीदार होने के साथ-साथ निवेश का भी बहुत बड़ा स्रोत है, इसलिए यहाँ ऊर्जा सहयोग और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला पर विशेष चर्चा होगी। इसके तुरंत बाद प्रधानमंत्री नीदरलैंड पहुंचेंगे, जहाँ वे प्रधानमंत्री रॉब जेटेन और वहां के शाही परिवार से मुलाकात करेंगे। नीदरलैंड की इस यात्रा के दौरान रक्षा, ग्रीन हाइड्रोजन और सेमीकंडक्टर जैसे भविष्य की तकनीकों से जुड़े नवाचारों पर विस्तार से बात की जाएगी।
यात्रा के अगले चरण में प्रधानमंत्री स्वीडन और फिर नॉर्वे का दौरा करेंगे। नॉर्वे की यह यात्रा ऐतिहासिक महत्व रखती है क्योंकि 1983 के बाद यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली नॉर्वे यात्रा है। यहाँ वे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे और नॉर्डिक देशों के साथ मिलकर नीली अर्थव्यवस्था और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा करेंगे। अपनी इस लंबी यात्रा के अंतिम पड़ाव में प्रधानमंत्री मोदी इटली पहुंचेंगे, जहाँ प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ रक्षा, सुरक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाने पर गहन विचार-विमर्श होगा।
विदेश मंत्रालय ने इस पूरी यात्रा को लेकर स्पष्ट किया है कि भारत इस समय बहुआयामी साझेदारी को और गहरा करना चाहता है। बातचीत के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उभरती प्रौद्योगिकियों, स्टार्टअप्स, और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखलाओं जैसे आधुनिक विषयों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसके साथ ही, पश्चिमी एशिया में जारी तनाव के कारण सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों को दूर करने और भारत के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए मित्र देशों के साथ मिलकर ठोस रणनीति तैयार की जाएगी। प्रधानमंत्री की यह यात्रा न केवल ऊर्जा संकट का समाधान खोजने की दिशा में एक कदम है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता को भी दर्शाती है।
