Baisakhi 2026: उत्तर भारत में हर्षोल्लास और नई उमंग का प्रतीक ‘बैसाखी’ का पर्व कल यानी 14 अप्रैल को मनाया जाएगा। यह त्योहार न केवल किसानों के लिए खुशहाली लेकर आता है, बल्कि इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। बैसाखी का समय रबी की फसल, विशेष रूप से गेहूं की कटाई का होता है, जब किसान अपनी सालभर की मेहनत घर आने की खुशी में प्रकृति और ईश्वर का आभार प्रकट करते हैं।
खगोल शास्त्र और ज्योतिष की दृष्टि से यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इस खगोलीय घटना को मेष संक्रांति या वैशाख संक्रांति भी कहा जाता है। इस वर्ष मंगलवार, 14 अप्रैल को सुबह करीब 9 बजकर 31 मिनट पर सूर्य मेष राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के इस राशि परिवर्तन के कारण उत्तराखंड में इसे ‘बिखोती’ और ओडिशा में ‘महा विशुव संक्रांति’ के रूप में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
बैसाखी के दिन पूजा, स्नान और दान का विशेष महत्व माना गया है। पंचांग के अनुसार, कल पुण्यकाल का समय सुबह 5 बजकर 56 मिनट से शुरू होकर दोपहर 3 बजकर 55 मिनट तक रहेगा। इस दौरान किसी पवित्र नदी में स्नान करना और जरूरतमंदों को दान देना अक्षय फल प्रदान करता है। उत्तराखंड में बिखोती उत्सव के दौरान लाटू देव की विशेष पूजा की जाती है और मंदिरों के बाहर पारंपरिक मेलों का आयोजन होता है, जहाँ देवताओं को ताजे अनाज का प्रसाद अर्पित किया जाता है।
सिख धर्म के लिए भी बैसाखी का दिन एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। इसे सिख नववर्ष के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन वर्ष 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की थी। पंजाब और हरियाणा में इस दिन का उत्साह देखते ही बनता है। लोग गुरुद्वारों में जाकर विशेष अरदास करते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब के पाठ का श्रवण करते हैं। बैसाखी का यह पर्व हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश देता है।
