परमाणु वार्ता विफल होने के बाद होर्मुज की जंग तेज, ट्रंप ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी का किया ऐलान

ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर आ गया है। परमाणु मुद्दे पर इस्लामाबाद वार्ता विफल होने के बाद, अब असली लड़ाई दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के नियंत्रण को लेकर छिड़ गई है।

Strait of Hormuz Crisis
Strait of Hormuz Crisis

Strait of Hormuz Crisis: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की ओर खींच लिया है। परमाणु विवाद से शुरू हुई यह टकराव की कहानी अब इस बेहद अहम समुद्री रास्ते पर नियंत्रण की जंग में बदलती नजर आ रही है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक महसूस किया जा रहा है।

दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा लेकिन बेहद रणनीतिक जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 27 प्रतिशत और एलएनजी का करीब 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और कीमतों पर पड़ता है।

तनाव की शुरुआत तब हुई जब इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े अधिकारियों ने मार्च की शुरुआत में इस जलमार्ग को बंद करने की धमकी दी। उनका कहना था कि यदि कोई जहाज इस रास्ते से गुजरने की कोशिश करेगा, तो उसे निशाना बनाया जाएगा। ईरान ने इसके पीछे अमेरिका और इजरायल के हमलों को वजह बताया।

इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फोकस इस जलमार्ग को खुलवाने पर आ गया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाने की कोशिश की, लेकिन शुरुआती दौर में खास सफलता नहीं मिली। हालात इतने बिगड़े कि अमेरिका को इस क्षेत्र में सैन्य सक्रियता बढ़ानी पड़ी।

हालांकि कुछ समय बाद युद्धविराम की घोषणा हुई और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने की बात सामने आई, लेकिन इसी बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया। रिपोर्ट्स में सामने आया कि ईरान इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने की तैयारी कर रहा है। इस प्रस्ताव की डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी आलोचना करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के नियमों के खिलाफ बताया।

तनाव ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता विफल हो गई। इस वार्ता में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी शामिल थे, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। इसके बाद अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नाकेबंदी की घोषणा कर दी।

अमेरिकी सैन्य कमान यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने स्पष्ट किया कि यह कदम राष्ट्रपति के निर्देश पर उठाया गया है। इस नाकेबंदी का असर ईरान से जुड़े समुद्री मार्गों पर पड़ सकता है, हालांकि गैर-ईरानी बंदरगाहों के लिए आवागमन को पूरी तरह बाधित नहीं किया जाएगा।

डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी कि जो जहाज ईरान को टोल देंगे, उन्हें सुरक्षित मार्ग नहीं दिया जाएगा। उन्होंने इसे परमाणु मुद्दे से जोड़ते हुए कहा कि ईरान इस पैसे का इस्तेमाल अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में कर सकता है।

कुल मिलाकर, परमाणु विवाद से शुरू हुआ यह टकराव अब वैश्विक व्यापार की धुरी माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण की लड़ाई बन चुका है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र की स्थिति न सिर्फ मध्य पूर्व बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।

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