उच्चतम न्यायालय ने धर्म के नाम पर दी जाने वाली पशु बलि पर रोक लगाने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस मामले में केंद्र को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। यह याचिका वकील श्रुति बिस्ट द्वारा दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिरों में होने वाली पशुओं की हत्या को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
इस याचिका में मुख्य रूप से ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ (Prevention of Cruelty to Animals Act) की धारा 28 को चुनौती दी गई है। वर्तमान प्रावधान के अनुसार, यदि किसी पशु की हत्या किसी धर्म की मान्यताओं के अनुसार की जाती है, तो उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह धारा पशुओं के संरक्षण के मूल उद्देश्य के खिलाफ है और इससे न केवल पशु अधिकारों का हनन होता है, बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों के भी विपरीत है।
याचिका में अदालत से मांग की गई है कि धार्मिक आयोजनों के दौरान पशु बलि को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं। साथ ही, समाज में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने और इस दिशा में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) का सहयोग लेने का भी सुझाव दिया गया है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा गया है कि जीवन का अधिकार केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पशुओं के जीवन की सुरक्षा भी शामिल है, जैसा कि शीर्ष अदालत ने अपने पिछले कई फैसलों में स्पष्ट किया है।
अब इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले जवाब पर चर्चा की जाएगी। यह मामला धार्मिक मान्यताओं और पशु अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस को जन्म दे सकता है।
