नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को उनके पद से हटाने के लिए विपक्षी दलों द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर आगामी 9 मार्च को चर्चा होने की संभावना है। यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब विपक्षी दलों ने एकजुट होकर स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोला और सदन चलाने के उनके तरीके पर गंभीर सवाल उठाए। विपक्ष का आरोप है कि सदन की कार्यवाही के दौरान स्पीकर का रवैया पक्षपातपूर्ण रहता है और वे विपक्ष की आवाज को अनसुना करते हैं। इस प्रस्ताव के आने के बाद से ही ओम बिरला ने खुद को सदन की कार्यवाही से दूर कर लिया है।
विपक्ष ने अपने आरोपों में कहा है कि अध्यक्ष ने सदन के भीतर कुछ ऐसी कार्रवाइयां की हैं जो पहले कभी नहीं देखी गईं। साथ ही उन पर कांग्रेस सदस्यों के खिलाफ गलत दावे करने के आरोप भी लगाए गए हैं। विवाद की एक बड़ी वजह यह भी है कि विपक्ष चाहता था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति के भाषण पर होने वाली चर्चा का जवाब देने के लिए खुद सदन में मौजूद रहें।
सदन में हंगामे की स्थिति फरवरी की शुरुआत से ही बनी हुई है। विवाद तब गहरा गया जब 2 फरवरी को कांग्रेस नेता राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवाने की किताब पर आधारित एक लेख पढ़ने की अनुमति नहीं दी गई, जिसमें भारत-चीन संघर्ष का जिक्र था। इस रोक के बाद विपक्ष का गुस्सा भड़क गया और लगातार हंगामे के चलते 4 फरवरी को प्रधानमंत्री मोदी सदन में अपना जवाब नहीं दे सके। आखिरकार 5 फरवरी को प्रधानमंत्री के भाषण के बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव को पारित कर दिया गया।
संवैधानिक नियमों की बात करें तो अनुच्छेद 94सी में अध्यक्ष को हटाने के प्रावधान दिए गए हैं। वहीं संविधान का अनुच्छेद 96 अध्यक्ष को यह अधिकार देता है कि वे सदन में अपना बचाव कर सकें। नियम के मुताबिक, जब उन्हें पद से हटाने के प्रस्ताव पर वोटिंग होती है, तो वे अपना मत तो डाल सकते हैं, लेकिन वोट बराबर होने की स्थिति में वे अपना निर्णायक मत नहीं दे पाएंगे। अब सबकी नजरें 9 मार्च पर टिकी हैं कि सदन में इस प्रस्ताव पर क्या रुख रहता है।
