Jyeshtha Purnima 2026: सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि को आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद पवित्र और कल्याणकारी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस पावन तिथि पर जो भी भक्त पूरी श्रद्धा, निष्ठा और नियमों के साथ देवों के देव भगवान विष्णु, धन की देवी मां लक्ष्मी और मन के कारक चंद्रदेव की उपासना करते हैं, उनके जीवन से सभी आर्थिक और मानसिक कष्ट दूर हो जाते हैं और घर में सुख, शांति तथा अटूट समृद्धि का वास होता है। आज यानी सोमवार, 29 जून 2026 को ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का पावन पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस विशेष दिन पर व्रत रखने, पवित्र नदियों में स्नान करने और अपनी क्षमता के अनुसार दान-पुण्य करने का सदियों पुराना महत्व है। वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, पूर्णिमा तिथि आज सुबह 4 बजकर 02 मिनट से प्रारंभ हो चुकी है और अगले दिन यानी 30 जून की सुबह 5 बजकर 53 मिनट तक प्रभावी रहेगी।
पूजा के अति शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय
आज ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान की आराधना के लिए कई विशेष और फलदायी मुहूर्त बन रहे हैं। दिन की शुरुआत में सबसे पहला और पवित्र मुहूर्त ‘ब्रह्म मुहूर्त’ सुबह 4 बजकर 06 मिनट से शुरू होकर 4 बजकर 46 मिनट तक रहा, जिसमें भक्तों ने दिन की पहली पूजा और स्नान संपन्न किया। इसके बाद, दिन का सबसे शक्तिशाली और सर्वकार्य सिद्धि दायक मुहूर्त ‘अभिजीत मुहूर्त’ दोपहर 11 बजकर 57 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगा, जिसमें भगवान सत्यनारायण की कथा और विशेष महापूजा करना सर्वोत्तम फल देगा। शाम के समय चंद्रदेव की पूजा के लिए ‘चंद्रोदय’ का समय ठीक 7 बजकर 16 मिनट पर निर्धारित है। शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा की रात को उदय होते हुए चंद्रमा को अर्घ्य (जल) देने से कुंडली में चंद्र दोष दूर होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा की प्रामाणिक पूजा विधि
यदि आप आज के दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की असीम कृपा पाना चाहते हैं, तो शास्त्रों में बताई गई इस सरल और प्रभावी पूजा विधि का पालन कर सकते हैं:
- पवित्र स्नान व संकल्प: ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन साधक को सुबह सूर्योदय से पूर्व जल्दी उठना चाहिए। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करें। घर पर स्नान करते समय सामान्य पानी में थोड़ा सा ‘गंगाजल’ मिलाकर स्नान करना भी नदी स्नान के समान ही पवित्र माना जाता है। स्नान के बाद साफ-सुथरे (संभव हो तो पीले या सफेद) वस्त्र धारण करें और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- विष्णु-लक्ष्मी आराधना: अपने घर के पूजा स्थल या मंदिर की अच्छे से साफ-सफाई करें और गाय के घी का एक दीपक प्रज्वलित करें। इसके बाद भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख बैठ जाएं। भगवान विष्णु को उनका अत्यंत प्रिय ‘तुलसी दल’ (तुलसी के पत्ते) और पीले रंग के फूल व फल अर्पित करें।
- महाभोग और कथा: धन और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें साबूदाने या मखाने की सफेद खीर का भोग लगाएं। इसके बाद वहीं बैठकर शांत मन से भगवान सत्यनारायण की कथा का श्रवण या वाचन करें। पूजा के समापन पर कपूर और दीपक से श्रीहरि और लक्ष्मी जी की आरती करें और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
- चंद्र अर्घ्य: शाम को जब चंद्रमा का उदय (7:16 PM) हो जाए, तब एक तांबे या चांदी के लोटे में कच्चा दूध, गंगाजल और अक्षत (चावल) मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें और अपने बेहतर स्वास्थ्य की कामना करें।
स्नान-दान का विशेष समय और महत्व
ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सूर्यास्त तक पूरे दिन स्नान और दान-पुण्य के कार्य किए जा सकते हैं। इस विशेष तिथि पर दान करने से मिलने वाला पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। चूंकि पूर्णिमा तिथि के स्वामी चंद्रदेव हैं, इसलिए इस दिन सफेद रंग की वस्तुओं का दान करना ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक मान्यताओं में विशेष रूप से कल्याणकारी और भाग्य को चमकाने वाला माना गया है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा, सामर्थ्य और आर्थिक स्थिति के अनुसार आज के दिन जरूरतमंदों या ब्राह्मणों को चावल, गाढ़ा दही, मीठी खीर, गाय का कच्चा दूध, सफेद चीनी, नए सफेद कपड़े या चांदी की किसी धातु का दान कर सकते हैं। ऐसा करने से पितृ दोषों से मुक्ति मिलती है और घर में बरकत बनी रहती है।
