मिडिल ईस्ट में बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव में नरमी और अमेरिकी डॉलर की कमजोरी के चलते हाल के सत्रों में सोने की कीमतों में तेज़ उछाल देखने को मिला है। वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक एक बार फिर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे कीमती धातुओं की मांग बढ़ी है। हालांकि घरेलू बाजार में सोना अभी भी अपने रिकॉर्ड स्तर से करीब 18 हजार रुपये से कुछ अधिक नीचे कारोबार कर रहा है, इसलिए निवेशकों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या आने वाले महीनों में सोने की कीमत 2 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच सकती है।
कमोडिटी एक्सचेंज एमसीएक्स (MCX) पर सोने की कीमत इंट्राडे ट्रेडिंग के दौरान 1,61,675 रुपये प्रति 10 ग्राम के उच्च स्तर तक पहुंच गई। हालांकि यह अभी भी 1,80,779 रुपये प्रति 10 ग्राम के लाइफटाइम हाई से करीब 18 हजार रुपये कम है। बाजार में यह तेजी उस समय आई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बयान दिया कि ईरान के साथ चल रहा संघर्ष उम्मीद से पहले खत्म हो सकता है। इससे मिडिल ईस्ट में तनाव कम होने की उम्मीद जगी, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिकी डॉलर कमजोर हुआ और तेल की कीमतों में भी गिरावट आई।
विशेषज्ञों के अनुसार कमजोर डॉलर की वजह से दूसरी मुद्राओं में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए सोना अपेक्षाकृत सस्ता हो जाता है, जिससे इसकी मांग बढ़ती है। वहीं तेल की कीमतों में गिरावट से युद्ध के कारण महंगाई बढ़ने का खतरा कम हो जाता है। जब महंगाई का दबाव कम होता है तो केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना भी कम हो जाती है, जो सोने जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट के लिए सकारात्मक संकेत माना जाता है।
हालांकि इस सप्ताह की शुरुआत में सोने की कीमतों में करीब 2 प्रतिशत की गिरावट भी देखी गई थी। उस समय कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से महंगाई को लेकर चिंता बढ़ गई थी, जिससे अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा जल्द ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर पड़ गई थी।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि सोने के बुनियादी कारक अभी भी मजबूत बने हुए हैं, लेकिन अल्पावधि में कीमतों में तुरंत नई ऊंचाई देखने के बजाय कुछ समय तक स्थिरता या सीमित उतार-चढ़ाव रह सकता है। यदि जियोपॉलिटिकल तनाव और कम होता है, तो डॉलर की मजबूती घट सकती है और जबरन लिक्विडेशन में कमी आ सकती है, जिससे सोना और चांदी फिर से तेजी पकड़ सकते हैं।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आगे की दिशा काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। यदि मिडिल ईस्ट में तनाव दोबारा बढ़ता है या लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर केवल अस्थायी झटके तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कमोडिटी और वित्तीय बाजारों में लंबी अवधि की अस्थिरता देखने को मिल सकती है। फिलहाल बुलियन मार्केट में हालिया उतार-चढ़ाव का मुख्य कारण लिक्विडिटी का दबाव माना जा रहा है, न कि सोने के मूलभूत कारकों में कोई बड़ी कमजोरी।
मार्केट एनालिस्टों का मानना है कि वैश्विक निवेशक अभी जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बनाकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर जा रहे हैं, जिसमें अमेरिकी डॉलर और सरकारी बॉन्ड जैसे साधन शामिल हैं। ऐसे माहौल में इक्विटी और अन्य जोखिम आधारित बाजारों में लिक्विडिटी कम हो सकती है। इसी बीच वैश्विक निवेश बैंक जेपी मॉर्गन ने सोने के दीर्घकालिक मूल्य अनुमान को लगभग 15 प्रतिशत बढ़ाकर 4,500 डॉलर प्रति औंस कर दिया है, जबकि 2026 के अंत तक इसके 6,300 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचने का अनुमान बरकरार रखा है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सोने की कीमतों में और तेजी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन 2 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम का स्तर कब तक हासिल होगा, यह काफी हद तक वैश्विक आर्थिक हालात और जियोपॉलिटिकल घटनाओं पर निर्भर करेगा।
