Budget 2026-27: वित्त मंत्री के साथ राज्यों की बैठक, GST घाटे और राजस्व पर छिड़ी रार

आगामी आम बजट 2026-27 की औपचारिक घोषणाओं से पहले केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यों के वित्त मंत्रियों के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण चर्चा की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य राज्यों की वित्तीय चिंताओं को समझना और बजट में उनके योगदान को सुनिश्चित करना था।

Budget 2026-27: FM Meets States, Tensions Rise Over GST Shortfall and Revenue Sharing
Budget 2026-27: FM Meets States, Tensions Rise Over GST Shortfall and Revenue Sharing

Budget 2026-27: आगामी आम बजट 2026-27 की औपचारिक घोषणाओं से पहले केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यों के वित्त मंत्रियों के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण चर्चा की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य राज्यों की वित्तीय चिंताओं को समझना और बजट में उनके योगदान को सुनिश्चित करना था।

एक तरफ जहां केंद्र सरकार मौजूदा वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7.4 प्रतिशत की शानदार दर से बढ़ने का भरोसा जता रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों ने अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर चिंताजनक तस्वीर पेश की है। राज्यों का कहना है कि उनकी कमाई के स्रोतों में लगातार कमी आ रही है, जिससे उनके विकास कार्यों और प्रशासनिक खर्चों पर बुरा असर पड़ रहा है।

इस बैठक में सबसे बड़ा मुद्दा 22 सितंबर को की गई जीएसटी दरों की कटौती से जुड़ा रहा। राज्यों का तर्क है कि टैक्स की दरों में कमी आने से उनके राजस्व संग्रह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। हालांकि एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि दरों के कम होने से उपभोग में बढ़ोतरी होगी और भविष्य में यह घाटा कम हो जाएगा, लेकिन तात्कालिक रूप से राज्यों को भारी राजस्व हानि का सामना करना पड़ रहा है। विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों ने विशेष रूप से यह मुद्दा उठाया कि इस 1.11 लाख करोड़ रुपये के संभावित कुल घाटे की भरपाई के लिए केंद्र को उन्हें विशेष आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए ताकि उनकी कल्याणकारी योजनाएं बाधित न हों।

राजस्व के अलावा सेस और सरचार्ज का मसला भी इस प्री-बजट मीटिंग में काफी गरमाया रहा। वर्तमान नियमों के अनुसार, राज्यों को केंद्रीय कर राजस्व का 41 प्रतिशत हिस्सा तो मिलता है, लेकिन सेस और सरचार्ज के माध्यम से होने वाली मोटी कमाई में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं होती।

राज्यों ने पुरजोर तरीके से मांग की कि केंद्र सरकार को इस नीति में बदलाव करना चाहिए और इन अतिरिक्त शुल्कों का एक निश्चित हिस्सा राज्यों के साथ साझा करना चाहिए। इसके साथ ही राज्यों ने केंद्रीय योजनाओं में अपनी बढ़ती वित्तीय भागीदारी, ऋण लेने की सीमा में विस्तार और प्राकृतिक आपदाओं के समय मिलने वाले विशेष पैकेजों पर भी चर्चा की।

बैठक के दौरान राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं के आर्थिक बोझ पर भी गंभीर मंथन हुआ। कई राज्य सरकारों ने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए जनता के खातों में सीधे पैसे भेजने की योजनाएं शुरू की हैं, जिससे उनके खजाने पर दबाव बढ़ा है। वित्त मंत्री के सामने यह चिंता जताई गई कि इन सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर बढ़ते खर्च के कारण राज्यों के पास बुनियादी ढांचे और निर्माण कार्यों के लिए बजट की कमी हो रही है। अंततः राज्यों ने केंद्र से ऐसी नीतियों की अपेक्षा की है जो न केवल संघीय ढांचे को मजबूत करें बल्कि उन्हें वित्तीय स्थिरता भी प्रदान करें।

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