शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व का उल्लास पूरे देश में बहुत धूमधाम से देखने को मिल रहा है। आश्विन शुक्ल षष्ठी यानी महाषष्ठी के दिन से दुर्गा पूजा का महापर्व आरंभ होता है और मां दुर्गा चार दिनों तक अपने भक्तों के बीच विराजमान रहने के बाद विजयादशमी के दिन नम आंखों से विदा ली जाती हैं। इस वर्ष दुर्गा विसर्जन और महाअष्टमी की तिथियों को लेकर लोगों के मन में जो असमंजस की स्थिति बनी हुई है, उसे पंचांग और ज्योतिषीय गणना के आधार पर पूरी तरह स्पष्ट किया जा रहा है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है। जिन घरों या पंडालों में कलश और माता की प्रतिमा स्थापित की जाती है, वहां दशमी के दिन पूजन संपन्न करने के बाद किसी पवित्र नदी, सरोवर या जल स्रोत में प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस वर्ष दशमी तिथि की शुरुआत 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से होगी और इसका समापन 21 अक्टूबर को दोपहर 02 बजकर 11 मिनट पर होगा। उदयातिथि और सनातन धार्मिक परंपराओं के मुताबिक, दुर्गा विसर्जन का मुख्य पर्व और मां की विदाई 21 अक्टूबर को ही मनाई जाएगी।
इस बार दुर्गा विसर्जन पर मां की विदाई के लिए भक्तों को केवल 2 घंटे 16 मिनट की एक सीमित और अत्यंत शुभ अवधि प्राप्त होगी। इसी निर्धारित समयावधि के भीतर विसर्जन से जुड़े सभी आवश्यक कर्मकांड, महाआरती और पारंपरिक ‘सिंदूर खेला’ की रस्में पूरी की जाएंगी। धार्मिक दृष्टिकोण से इस दिन रवि योग का एक महासंयोग भी बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में रवि योग को बेहद शक्तिशाली और शुभ माना गया है। ऐसी मान्यता है कि रवि योग के दौरान किए जाने वाले सभी धार्मिक अनुष्ठान और माता की विदाई से जीवन के सारे कष्ट दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
शास्त्रों के अनुसार, दशमी तिथि के दिन जब श्रवण नक्षत्र का संयोग बनता है, तभी विजयादशमी का पर्व और दुर्गा विसर्जन पूर्ण रूप से फलदायी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन नक्षत्र में भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त की थी और मां दुर्गा ने असुर महिषासुर का संहार किया था। श्रवण नक्षत्र में माता की विदाई करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
दुर्गा विसर्जन से ठीक पहले आने वाली महाअष्टमी यानी दुर्गा अष्टमी के व्रत को लेकर भी लोगों में तारीख को लेकर चर्चा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि की शुरुआत 18 अक्टूबर (रविवार) को सुबह 08 बजकर 27 मिनट पर होगी और इसका समापन 19 अक्टूबर (सोमवार) को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर होगा। चूंकि 18 अक्टूबर को सुबह सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि रहती है और उसके बाद 08:27 बजे से अष्टमी लग जाती है, वहीं 19 अक्टूबर को सुबह 10:51 बजे तक अष्टमी रहती है और उसके बाद नवमी तिथि शुरू हो जाती है।
18 अक्टूबर को पूरे दिन और शाम के समय अष्टमी तिथि विद्यमान रहने के कारण जो लोग संधि पूजा और मां महागौरी की विशेष आराधना करते हैं, उनके लिए 18 अक्टूबर का दिन विशेष रूप से उत्तम रहेगा। वहीं, जो श्रद्धालु शुद्ध उदयातिथि की परंपरा का पालन करते हैं, वे 19 अक्टूबर को सुबह 10:51 बजे से पहले अष्टमी पूजन और कन्या पूजन संपन्न कर सकते हैं।
दशमी के दिन मां की विदाई की विधि के तहत प्रातःकाल स्नान करके मां दुर्गा की अंतिम आरती की जाती है और उन्हें फल, मिष्ठान, खीर व पूरी का विशेष भोग लगाया जाता है। इसके बाद सुहागिन महिलाएं मां को पान, बताशे और सिंदूर अर्पित कर आपस में ‘सिंदूर खेला’ की रस्म निभाती हैं। अंत में मां से परिवार के कल्याण की प्रार्थना करते हुए क्षमा याचना की जाती है और गाजे-बाजे के साथ प्रतिमा को विसर्जन स्थल तक ले जाया जाता है।
