भारत सरकार विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) में संशोधन की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य विदेश से मिलने वाले फंड की निगरानी को और सख्त बनाना, वास्तविक दानदाता (Ultimate Donor) की पहचान सुनिश्चित करना तथा धन के उपयोग में अधिक पारदर्शिता लाना है। इन प्रस्तावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने इसका विरोध करते हुए इसे ईसाई समुदाय के खिलाफ कदम बताया है, जबकि भारत का कहना है कि ऐसे नियम दुनिया के कई देशों में पहले से लागू हैं।
प्रस्तावित संशोधनों के तहत विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों को फंड का पूरा रिकॉर्ड रखना, वास्तविक दानदाता की जानकारी देना और धन के उपयोग का विस्तृत ब्यौरा उपलब्ध कराना होगा। सरकार का तर्क है कि इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि विदेशी धन का उपयोग केवल घोषित उद्देश्यों के लिए हो और उसका दुरुपयोग या किसी प्रकार का अनुचित प्रभाव न पड़े।
अमेरिका में भी विदेशी प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए Foreign Agents Registration Act (FARA) लागू है। इस कानून के तहत कोई भी व्यक्ति या संस्था यदि किसी विदेशी सरकार, संगठन या इकाई के निर्देश या वित्तीय सहायता पर लॉबिंग, जनसंपर्क या नीतिगत गतिविधियां संचालित करती है, तो उसे अमेरिकी न्याय विभाग के समक्ष पंजीकरण कराना होता है। साथ ही फंडिंग के स्रोत, राशि और खर्च का विस्तृत विवरण देना अनिवार्य होता है।
यूरोप के कई देशों ने भी विदेशी फंडिंग को लेकर निगरानी बढ़ाई है। स्लोवाकिया में निर्धारित सीमा से अधिक विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों को हर वर्ष अपने दानदाताओं की पूरी जानकारी सरकार को देनी होती है। सरकार को उनके वित्तीय रिकॉर्ड की जांच करने और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई का अधिकार भी प्राप्त है।
जॉर्जिया ने भी हाल के वर्षों में Foreign Influence Transparency Law लागू किया है। इसके तहत जिन गैर-लाभकारी संस्थाओं या मीडिया संगठनों की 20 प्रतिशत से अधिक फंडिंग विदेश से आती है, उन्हें विदेशी वित्तपोषित संस्था के रूप में पंजीकरण कराना पड़ता है। कानून में नियमित वित्तीय खुलासा, सरकारी ऑडिट और नियमों के उल्लंघन पर आर्थिक दंड का प्रावधान है।
रूस में विदेशी फंडिंग को लेकर और भी सख्त व्यवस्था लागू है। विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए पंजीकरण अनिवार्य है। उन्हें अपनी सार्वजनिक सामग्री में विदेशी वित्तपोषण का स्पष्ट उल्लेख करना होता है। सरकारी एजेंसियां उनके खातों और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर सकती हैं और नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द करने या संस्था के संचालन पर रोक लगाने जैसी कार्रवाई भी कर सकती हैं।
भारत के मौजूदा FCRA कानून में भी विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण, समय-समय पर लाइसेंस का नवीनीकरण, धन के उपयोग की निगरानी और उल्लंघन की स्थिति में सख्त कार्रवाई का प्रावधान पहले से मौजूद है। प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य इन व्यवस्थाओं को और मजबूत बनाना बताया जा रहा है।
कुल मिलाकर, विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर भारत अकेला देश नहीं है। अमेरिका, स्लोवाकिया, जॉर्जिया और रूस सहित कई देशों में भी ऐसे कानून लागू हैं, जिनका उद्देश्य विदेशी वित्तीय सहायता के स्रोत और उसके उपयोग को सरकारी निगरानी के दायरे में रखना है। हालांकि, अलग-अलग देशों में इन कानूनों का दायरा और उनका क्रियान्वयन अलग हो सकता है, इसलिए उनकी प्रत्यक्ष तुलना करते समय कानूनी और संवैधानिक संदर्भों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
