सनातन परंपरा में माता पार्वती की पूजा मनचाहा जीवनसाथी दिलाने और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्रदान करने वाली मानी जाती है। अखंड सौभाग्य का वरदान देने वाली मां पार्वती को समर्पित ‘कोकिला व्रत’ हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को रखा जाता है। कुछ लोग इसे आषाढ़ पूर्णिमा से प्रारंभ करके श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि तक भी रखते हैं।
कोकिला व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, इस साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई 2026, मंगलवार की शाम को 06:18 बजे प्रारंभ हो रही है और अगले दिन 29 जुलाई 2026, बुधवार की रात को 08:05 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि और प्रदोष काल के आधार पर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित यह व्रत 28 जुलाई 2026, मंगलवार को रखा जाएगा। इस पावन व्रत की पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त यानी प्रदोष काल 28 जुलाई को शाम 07:15 बजे से रात्रि 09:20 बजे तक रहेगा।
पूजा विधि
शीघ्र विवाह और सुखी दांपत्य जीवन की मनोकामना पूर्ति के लिए प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान-ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पवित्र मिट्टी से मां पार्वती का प्रतीक मानी जाने वाली कोयल की प्रतिमा बनाएं और उसे शिव-पार्वती के चित्र या मूर्ति के साथ चौकी पर स्थापित करें। शुद्ध जल या गंगाजल छिड़कने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती को पुष्प, चंदन, धूप-दीप, बेलपत्र, भांग, धतूरा, मौसमी फल और मिष्ठान अर्पित करते हुए विधि-विधान से पूजा करें।
इस व्रत का पूजन शाम को प्रदोष काल में करना बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ करें और अंत में आरती जरूर करें। इस व्रत में पूरे दिन निराहार या फलाहार रहकर शाम को शिव-पार्वती को भोग लगाने के बाद सात्विक अन्न ग्रहण किया जाता है।
नियम और धार्मिक महत्व
कुंआरी कन्याएं मनचाहे वर और शीघ्र विवाह की कामना के लिए, जबकि सुहागिन महिलाएं सुखी दांपत्य जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं। नियम-संयम का पालन करते हुए दिन में सिर्फ एक बार सात्विक भोजन करने का विधान है। जो लोग इस व्रत को आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा तक एक महीने के लिए रखते हैं, वे इसमें विशेष जड़ी-बूटियों से स्नान करते हैं। इसके अलावा, व्रत समाप्ति के बाद पूजी गई मिट्टी की कोयल को ससुर या किसी योग्य ब्राह्मण को भेंट करने की परंपरा है।
कोकिला व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवी सती ने पिता राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए, तो क्रोधित महादेव ने राजा दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया। इसके साथ ही बिना आज्ञा प्राण त्यागने के कारण उन्होंने देवी सती को हजारों वर्षों तक कोयल के रूप में भटकने का श्राप दिया। श्राप के कारण देवी सती ने कोयल के स्वरूप में हजारों वर्षों तक शिव साधना की, जिसके पुण्यफल से उन्हें पुनर्जन्म में माता पार्वती के रूप में जन्म मिला। इसके बाद देवी पार्वती ने 5000 वर्षों तक कठिन तपस्या करके पुनः महादेव को पति के रूप में प्राप्त किया। तभी से माता पार्वती के इस कोयल स्वरूप (कोकिला) की पूजा की परंपरा चली आ रही है।
