देव स्नान पूर्णिमा 2026: भगवान जगन्नाथ का 108 कलशों से महास्नान, जानें स्नान यात्रा और गज वेश का महत्व

Dev Snana Purnima 2026: सनातन परंपरा में प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है, लेकिन जब यह ज्येष्ठ मास में आती है, तो इसका आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस पावन तिथि को ‘देव स्नान पूर्णिमा’ या पुरी धाम में ‘स्नान यात्रा’ के नाम से जाना जाता है।

पुरी में आज भगवान जगन्नाथ की 'स्नान यात्रा'
पुरी में आज भगवान जगन्नाथ की 'स्नान यात्रा'

Dev Snana Purnima 2026: सनातन परंपरा में प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस तिथि को देव स्नान पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। पुरी में इसे ‘स्नान यात्रा’ के नाम से जाना जाता है। इस पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का विशेष जलाभिषेक किया जाता है, जिसे भक्त अत्यंत शुभ मानते हैं।

पुरी जगन्नाथ रथयात्रा का कई दशकों से आंखों देखा हाल बताने वाले अशोक पांडेय के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र को गर्भगृह से ढोल, मृदंग, शंखध्वनि और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्नान मंडप तक लाया जाता है। इस परंपरा को ‘पहंडी विजय’ कहा जाता है। इसके बाद विधि-विधान से तीनों देवताओं का महास्नान कराया जाता है।

भगवान जगन्नाथ के महास्नान के लिए स्वर्णकूप से 108 सोने के जल कलशों में जल लाया जाता है। स्नान से पहले पुजारियों द्वारा पूजा-अनुष्ठान किया जाता है। जल में पुष्प, चंदन, कपूर, केसर सहित विभिन्न सुगंधित द्रव्य मिलाकर विशेष मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है और फिर भगवान का अभिषेक किया जाता है।

महास्नान के दौरान 108 जल कलशों का विभाजन भी निर्धारित परंपरा के अनुसार किया जाता है। इनमें से 35 कलशों के जल से भगवान जगन्नाथ का, 33 कलशों से भगवान बलभद्र का और 22 कलशों से देवी सुभद्रा का स्नान कराया जाता है। शेष 18 कलशों के जल से सुदर्शन चक्र का अभिषेक किया जाता है।

महास्नान के बाद भगवान को पहले ‘सादा वेश’ और फिर ‘गज वेश’ या ‘हाथी वेश’ में सजाया जाता है। अशोक पांडेय के अनुसार, इस परंपरा के पीछे एक लोककथा प्रचलित है। मान्यता है कि महाराष्ट्र के गणपति उपासक विनायक भट्ट स्नान यात्रा के दौरान पुरी पहुंचे थे। उन्होंने भगवान जगन्नाथ के गणेश स्वरूप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने मंदिर के पुजारी को स्वप्न में दर्शन देकर महास्नान के बाद गजानन वेश धारण कराने का निर्देश दिया। तभी से भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के गज वेश के दर्शन और पूजन की परंपरा चली आ रही है।

हिंदू मान्यता के अनुसार, स्नान यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा मंदिर परिसर में स्थित ‘अनसार’ घर में विश्राम करते हैं। इस अवधि में श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन नहीं होते। मान्यता है कि इस दौरान भगवान को स्वास्थ्य लाभ के लिए औषधि दी जाती है। इसके लगभग दो सप्ताह बाद, रथ यात्रा से एक दिन पहले श्रद्धालुओं को तीनों देवताओं के पुनः दर्शन होते हैं।

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