Skanda Shashthi 2026: कब है स्कंद षष्ठी व्रत? जानें तिथि, पूजा विधि और धार्मिक महत्व

Jyeshtha Skanda Shashthi 2026: हिंदू धर्म में षष्ठी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। हर महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कंद षष्ठी का व्रत रखा जाता है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित है।

स्कंद षष्ठी व्रत 2026 (Image: ChatGPT)
स्कंद षष्ठी व्रत 2026 (Image: ChatGPT)

Skanda Shashthi Vrat 2026: हिंदू धर्म में प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दिन भगवान कार्तिकेय की आराधना के लिए स्कंद षष्ठी व्रत रखा जाता है। भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय को साहस, शौर्य और विजय का देवता माना जाता है। भक्त इस दिन उपवास रखकर विधि-विधान से उनकी पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य तथा संतान सुख की कामना करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्कंद षष्ठी का व्रत भगवान कार्तिकेय की विशेष कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास और सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। ज्येष्ठ मास में आने वाली स्कंद षष्ठी भी विशेष फलदायी मानी गई है।

स्कंद षष्ठी 2026 कब है?

जून 2026 में पड़ने वाले ज्येष्ठ मास के स्कंद षष्ठी व्रत की तिथियों और शुभ समय की बात करें तो द्रिक पंचांग के अनुसार, षष्ठी तिथि का प्रारंभ 19 जून 2026 को शाम 5:00 बजे होगा। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 20 जून 2026 को दोपहर 3:47 बजे होगा। उदयातिथि की मान्यताओं के अनुसार, स्कन्द षष्ठी का व्रत 20 जून 2026, शनिवार के दिन रखा जाएगा।

स्कंद षष्ठी पूजा विधि

इस व्रत की निर्धारित पूजा विधि के अनुसार, साधक को सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल पर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान कार्तिकेय की मूर्ति या तस्वीर स्थापित की जाती है। यदि भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा उपलब्ध न हो, तो शिव-पार्वती की पूजा के साथ ही उनका ध्यान किया जा सकता है।

पूजा के दौरान भगवान कार्तिकेय को रोली, चंदन, अक्षत, फल, फूल और हल्दी अर्पित की जाती है। इसके बाद धूप, दीप और अगरबत्ती जलाकर उन्हें मिठाई और फलों का भोग लगाया जाता है। साधना के समय स्कन्द षष्ठी व्रत कथा का पाठ किया जाता है और भगवान कार्तिकेय के मंत्रों का जाप होता है। अंत में दीपक या कपूर से आरती करके पूजा संपन्न की जाती है।

स्कंद षष्ठी का धार्मिक महत्व

स्कन्द षष्ठी के धार्मिक महत्व को देखें तो मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर भगवान कार्तिकेय ने अत्याचारी राक्षस तारकासुर का वध करके देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी। इसी वजह से भगवान कार्तिकेय को देवसेनापति और युद्ध के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। यह पावन पर्व जीवन में बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है और काम, क्रोध तथा लोभ जैसे आंतरिक विकारों पर नियंत्रण पाने का प्रतीक माना जाता है। ऐसी दृढ़ मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय की निष्ठापूर्वक पूजा करने से मन का भय दूर होता है, आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और व्यक्ति को अपने हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है।

व्रत से मिलने वाले शुभ फल

मान्यता है कि स्कंद षष्ठी का व्रत रखने और भगवान कार्तिकेय की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण होती है तथा बच्चों के स्वास्थ्य और उन्नति का आशीर्वाद मिलता है। इसके अलावा जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

धार्मिक दृष्टि से यह व्रत साहस, ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करने वाला माना गया है। इसलिए ज्येष्ठ मास की स्कंद षष्ठी पर श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना कर भगवान कार्तिकेय का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना करते हैं।

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