Strait of Hormuz Crisis: साल 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष एक बार फिर बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा अमेरिकी एमक्यू-1 ड्रोन को मार गिराए जाने के जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के दो प्रमुख ठिकानों पर भीषण हवाई हमले किए हैं।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इस कार्रवाई को विशुद्ध रूप से आत्मरक्षा में उठाया गया कदम बताया है। अमेरिकी फाइटर जेट्स ने शनिवार और रविवार को तेजी से जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान के गोरुक और केश्म द्वीप को निशाना बनाया। इन सटीक हमलों में ईरानी सेना का एयर डिफेंस रडार सिस्टम, कमांड नेटवर्क, ड्रोन कंट्रोल स्टेशन और दो हमलावर ड्रोन पूरी तरह नष्ट कर दिए गए हैं। यह सैन्य टकराव ऐसे समय में हुआ है जब दोनों देशों के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने के लिए बेहद संवेदनशील युद्धविराम के तहत बातचीत चल रही थी।
अमेरिकी सेना का दावा है कि उनका एमक्यू-1 ड्रोन अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा में नियमित उड़ान पर था, जिसे ईरान ने बिना किसी उकसावे के मार गिराया। वॉशिंगटन के अनुसार, केश्म द्वीप पर नष्ट की गई ड्रोन सुविधाएं और ईरानी रडार क्षेत्र से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाजों के लिए एक बड़ा खतरा बन सकते थे। इस पूरी सैन्य कार्रवाई में किसी भी अमेरिकी सैनिक के घायल होने की खबर नहीं है।
दूसरी तरफ, ईरान ने इन अमेरिकी हमलों की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इन्हें अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। ईरानी अधिकारियों का दावा है कि अमेरिकी ड्रोन उनके हवाई क्षेत्र में अवैध रूप से घुस आया था, जिसके बाद उन्होंने कार्रवाई की। तेहरान ने साफ किया है कि वे अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई है।
इस बार के संघर्ष में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव देखने को मिला है, जहाँ ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात की बजाय कुवैत को अपने निशाने पर लिया है। ईरान ने कुवैत में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे पर मिसाइल दागकर हमला किया, जिसमें पांच अमेरिकी सैनिक घायल हो गए हैं। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि कुवैत में अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी है, जिसके कारण यह क्षेत्र ईरान के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस हमले के पीछे इजरायली हथियारों का कनेक्शन हो सकता है, क्योंकि पिछले संघर्ष में इजरायल ने अमेरिकी समर्थन के साथ ईरान के खिलाफ काम किया था। कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर ईरान दरअसल अमेरिका और इजरायल दोनों को एक साथ यह कड़ा संदेश देना चाहता है कि क्षेत्र में उनके सहयोगी देश भी अब सुरक्षित नहीं हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और वर्तमान युद्धविराम को गहरे जोखिम में डाल दिया है। पिछले संघर्ष के दौरान इस जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी मात्र से ही दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ गया था। हालांकि, दोनों देशों के बीच इसे दोबारा खोलने और प्रतिबंधों को हटाने को लेकर एक अस्थाई समझौता हुआ था, लेकिन हालिया ड्रोन विवाद और जवाबी हमलों ने इस शांति वार्ता को पटरी से उतार दिया है।
अमेरिका जहाँ ईरान के मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम पर पूरी तरह अंकुश लगाना चाहता है, वहीं ईरान क्षेत्र में अपने प्रभाव और सुरक्षा की पक्की गारंटी मांग रहा है। अमेरिका ने इस बार पूर्ण युद्ध के बजाय सीमित और सटीक हमलों की रणनीति अपनाई है ताकि तनाव को नियंत्रित रखते हुए ईरान को सख्त चेतावनी दी जा सके।
ईरान के पास मौजूद भूमिगत मिसाइल बेस और उन्नत ड्रोन क्षमता के कारण खाड़ी के अन्य देश जैसे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी हाई अलर्ट पर आ गए हैं। कुवैत पर हुए इस हमले ने पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन दोनों पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्ण युद्ध किसी के भी हित में नहीं है, और यदि यह अस्थायी युद्धविराम पूरी तरह टूटता है, तो न केवल अमेरिका और ईरान बल्कि पूरा मध्य पूर्व एक भयानक अस्थिरता की चपेट में आ जाएगा, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
