पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर असंतोष और नेतृत्व को लेकर उठते सवाल अब खुलकर सामने आने लगे हैं। सत्ता में बदलाव के बाद कई ऐसे नेता और पूर्व जनप्रतिनिधि पार्टी से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं, जो कभी संगठन के बेहद करीब माने जाते थे। इस बदलाव के साथ ही राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है और कई नेताओं ने सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व पर निशाना साधा है।
बैरकपुर के पूर्व विधायक और फिल्ममेकर राज चक्रवर्ती ने हाल ही में टीएमसी से अलग होने का संकेत देते हुए कहा कि राजनीति अब उनके लिए नहीं है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी राजनीतिक यात्रा का जिक्र करते हुए लिखा कि 2021 में उन्होंने जनता के आशीर्वाद से राजनीति में कदम रखा और पांच वर्षों तक विधायक के रूप में काम किया, लेकिन अब यह अध्याय समाप्त हो रहा है। उनके इस बयान को पार्टी से दूरी बनाने के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं, टीएमसी के ही कुछ अन्य प्रमुख चेहरों ने भी अलग-अलग सुर में प्रतिक्रिया दी है। सांसद और अभिनेता देव ने भाजपा की जीत को जनादेश मानते हुए उसे बधाई दी और साथ ही बंगाल में बेहतर प्रशासन की उम्मीद जताई, जिससे सामाजिक सौहार्द बना रहे। यह रुख पार्टी लाइन से अलग माना जा रहा है।
इसके अलावा पूर्व मंत्री रबींद्रनाथ घोष ने पार्टी के भीतर गुटबाजी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि टीएमसी अब दो हिस्सों में बंटती दिख रही है, जिसमें एक पक्ष मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ है, जबकि दूसरा पक्ष अभिषेक बनर्जी के प्रभाव में काम करता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि संगठन में आंतरिक टकराव बढ़ा है, जिसका असर पार्टी की एकजुटता पर पड़ा है।
इसी तरह पूर्व मंत्री और क्रिकेटर मनोज तिवारी ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि टिकट वितरण के दौरान उनसे आर्थिक मांग की गई थी, जिसके चलते उन्हें चुनावी मैदान से बाहर रहना पड़ा। उनके इस बयान ने भी पार्टी के भीतर विवाद को और गहरा कर दिया है।
इन सभी घटनाओं के बीच यह साफ दिख रहा है कि टीएमसी के अंदर नेतृत्व, संगठन और रणनीति को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। कई नेता अब सीधे तौर पर नेतृत्व शैली और फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति स्पष्ट होती जा रही है।
