सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार: नेताजी बोस पर बार-बार PIL दाखिल करने वाले शख्स पर लगाया ‘बैन’, रजिस्ट्री को सख्त निर्देश

सुभाष चंद्र बोस को लेकर बार-बार एक जैसी जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ता को सख्त फटकार लगाई है। अदालत ने साफ निर्देश दिया है कि अब इस याचिकाकर्ता की कोई भी PIL भविष्य में स्वीकार नहीं की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी मांगों को लेकर बार-बार एक ही तरह की जनहित याचिकाएं दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता पिनाक पाणि मोहंती को सोमवार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने न केवल याचिकाकर्ता की नई अर्जी को खारिज कर दिया, बल्कि अपनी रजिस्ट्री को यह कड़ा निर्देश भी दिया कि भविष्य में इस व्यक्ति की किसी भी जनहित याचिका (PIL) को स्वीकार न किया जाए। अदालत ने यह कदम याचिकाकर्ता द्वारा बार-बार एक ही मुद्दे को उठाकर अदालत का समय बर्बाद करने के कारण उठाया है।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान पाया कि ओडिशा के कटक निवासी मोहंती पहले भी दो बार इसी तरह की याचिकाएं पेश कर चुके थे। उनकी एक याचिका का निपटारा 6 जनवरी 2024 को किया गया था और दूसरी याचिका पर उसी साल 18 नवंबर को सुनवाई हुई थी। इन याचिकाओं के माध्यम से मोहंती ने नेताजी को ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित करने, उनकी मृत्यु की नए सिरे से जांच कराने और भारत की आजादी का मुख्य श्रेय नेताजी व आजाद हिंद फौज को देने जैसी मांगें रखी थीं।

सुनवाई के दौरान जब मोहंती खुद अपनी पैरवी करने के लिए पेश हुए, तो जजों ने उन्हें आड़े हाथों लिया। चीफ जस्टिस ने नाराजगी जताते हुए यहां तक कह दिया कि वह इस याचिकाकर्ता का सुप्रीम कोर्ट आना बंद करवा देंगे। हालांकि मोहंती ने खुद को एक गंभीर याचिकाकर्ता साबित करने की कोशिश की और अपने पुराने मामलों का हवाला दिया, लेकिन कोर्ट उनके तर्कों से सहमत नहीं हुआ। बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि याचिकाकर्ता का उद्देश्य केवल प्रचार हासिल करना लगता है।

अदालत ने मोहंती से उनके वकील के बारे में भी सवाल पूछे और जानना चाहा कि क्या उन्होंने अपने वकील को पुरानी याचिकाओं के बारे में जानकारी दी थी। मोहंती के यह कहने पर कि यह याचिका पुरानी याचिकाओं से अलग है, जज संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना। अंततः कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि भविष्य में इस याचिकाकर्ता की किसी भी पीआईएल को स्वीकार न किया जाए, ताकि न्यायपालिका के कीमती समय को व्यक्तिगत एजेंडे के लिए बर्बाद होने से बचाया जा सके।

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