US–Iran Talks: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी सैन्य तनाव के बीच कूटनीति की एक नई उम्मीद जगती नजर आ रही है। ओमान में शुक्रवार को हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक सकारात्मक शुरुआत करार दिया है। ट्रंप ने संकेत दिया कि ईरान किसी समझौते के लिए तैयार दिख रहा है, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतिम फैसला समझौते की शर्तों के आधार पर ही लिया जाएगा। पिछले साल ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हुए अमेरिकी-इजराइली हमलों के बाद यह दोनों देशों के बीच पहली औपचारिक बातचीत थी, जिसने भविष्य की चर्चाओं के लिए रास्ता खोल दिया है।
ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी की मध्यस्थता में हुई इस बैठक में ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ शामिल हुए। इस दौरान राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जारेड कुश्नर भी प्रक्रिया का हिस्सा रहे। ईरान का कहना है कि यह बातचीत सिर्फ उसके परमाणु कार्यक्रम तक ही सीमित रही और उसने बैलिस्टिक मिसाइलों या क्षेत्रीय गुटों पर चर्चा से इनकार कर दिया है। तेहरान ने प्रस्ताव दिया है कि यदि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटा दिए जाते हैं, तो वह यूरेनियम संवर्धन को 60 प्रतिशत तक सीमित रखने और अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बनाए रखने की गारंटी दे सकता है। हालांकि, अमेरिका चाहता है कि भविष्य के किसी भी समझौते में ईरान का मिसाइल कार्यक्रम और मानवाधिकार जैसे मुद्दे भी शामिल हों।
इस कूटनीतिक हलचल के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की एक अनुपस्थिति ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अटकलें तेज कर दी हैं। 8 फरवरी को वायुसेना कमांडरों की सालाना बैठक में खामेनेई शामिल नहीं हुए, जबकि 1989 में सत्ता संभालने के बाद से वे हर साल इस कार्यक्रम का हिस्सा रहे हैं। 37 साल में यह पहली बार है जब सर्वोच्च नेता इस महत्वपूर्ण सैन्य बैठक से नदारद रहे। उनकी गैरमौजूदगी को क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ती सैन्य तैनाती और संभावित सुरक्षा खतरों से जोड़कर देखा जा रहा है।
फिलहाल दोनों देशों ने अपने-अपने मुख्यालयों से सलाह लेने के बाद बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि बातचीत का अगला दौर अगले हफ्ते की शुरुआत में हो सकता है। हालांकि, दोनों पक्षों के बीच यूरेनियम संवर्धन को लेकर मुख्य विवाद अब भी बरकरार है। जहां ईरान इसे अपना अधिकार मानता है, वहीं अमेरिका इसे परमाणु हथियारों की दिशा में बढ़ता कदम मानता है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि यह कूटनीतिक पहल किसी ठोस समझौते में बदल पाती है या तनाव एक बार फिर सैन्य मोर्चे पर लौट आता है।
