अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला में की गई सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद दुनिया के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप लियो (Pope Leo XIV) ने अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। शुक्रवार, 9 जनवरी 2026 को वेटिकन में 184 देशों के राजदूतों को संबोधित करते हुए पोप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वैश्विक राजनीति में “बातचीत और कूटनीति की जगह अब ताकत और हथियारों का जुनून” लेता जा रहा है।
वेटिकन में दिए गए अपने इस वार्षिक ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड’ (State of the World) भाषण में पोप लियो ने किसी का नाम लिए बिना ट्रंप की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में युद्ध फिर से ‘चलन’ में आ गया है और शांति की तलाश न्याय के बजाय वर्चस्व स्थापित करने के लिए की जा रही है। उन्होंने वेनेजुएला के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए सभी देशों और संगठनों से अपील की कि वे वहां के लोगों की लोकतांत्रिक इच्छा और मानवाधिकारों का सम्मान करें।
अमेरिकी मूल के पहले पोप होने के नाते लियो का यह बयान काफी वजन रखता है। पोप लियो, जिनका मूल नाम रॉबर्ट प्रेवोस्ट (Robert Prevost) है, पिछले साल मई 2025 में पोप फ्रांसिस के निधन के बाद चुने गए थे। शिकागो में जन्मे पोप लियो ने दशकों तक पेरू में एक मिशनरी के रूप में काम किया है, इसलिए दक्षिण अमेरिका की राजनीति और वहां के लोगों के संघर्षों से उनका गहरा जुड़ाव रहा है। उनके भाषण के दौरान हॉल में अमेरिका और वेनेजुएला के राजदूत भी मौजूद थे, जिससे माहौल काफी गंभीर बना रहा।
43 मिनट के अपने इस विस्तृत संबोधन में पोप ने केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि कई सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने ‘पश्चिमी देशों’ में सिकुड़ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) पर चिंता जताई और कहा कि यूरोप और अमेरिका में ईसाइयों के खिलाफ धार्मिक भेदभाव बढ़ रहा है। इसके अलावा, उन्होंने गर्भपात (Abortion), इच्छामृत्यु (Euthanasia) और सरोगेसी की कड़ी आलोचना करते हुए इन्हें मानवीय गरिमा के खिलाफ बताया।
