Bangladesh Election 2026: अवामी लीग के बिना हो रहा ऐतिहासिक चुनाव, क्या तारिक रहमान बनेंगे पीएम?

Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश में गुरुवार, 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। यह चुनाव भले ही नियमित संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा हो, लेकिन सियासी मायनों में इसे देश के इतिहास का सबसे अहम चुनाव माना जा रहा है।

Bangladesh Election 2026: Will Tarique Rahman Become PM?
Bangladesh Election 2026: Will Tarique Rahman Become PM?

Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश में गुरुवार, 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। यह चुनाव भले ही नियमित संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा हो, लेकिन सियासी मायनों में इसे देश के इतिहास का सबसे अहम चुनाव माना जा रहा है। वजह साफ है—इस बार चुनावी मैदान में अवामी लीग मौजूद नहीं है और ऐसे में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सबसे बड़ी और प्रभावशाली पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई है।

बीएनपी बांग्लादेश की पुरानी और प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में से एक है, जिसकी स्थापना 1 सितंबर 1978 को तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर्रहमान ने की थी। पार्टी ने 1991 में पहली बार सत्ता हासिल की, जब खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद 2001 में भी बीएनपी ने सरकार बनाई, हालांकि उस दौरान जमात-ए-इस्लामी गठबंधन का हिस्सा थी। साल 2006 के बाद से बीएनपी सत्ता से बाहर रही और 2009, 2014, 2018 तथा 2024 के चुनावों में शेख हसीना की अवामी लीग ने लगातार बड़ी जीत दर्ज की। 2014 में बीएनपी ने चुनावों में धांधली के आरोप लगाए थे, जबकि 2024 के आम चुनाव का उसने बहिष्कार कर दिया था।

5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश की राजनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। अवामी लीग पर चुनावी प्रतिबंध लग गया और राजनीतिक मैदान में बीएनपी एक बार फिर मुख्य दावेदार बनकर उभरी। मौजूदा चुनाव में मुकाबला मुख्य रूप से बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच माना जा रहा है।

इस बदले हुए सियासी परिदृश्य में तारिक रहमान का रोल बेहद अहम हो गया है। शेख हसीना के सत्ता में रहते हुए खालिदा जिया जेल में थीं और उनके बेटे तारिक रहमान लंदन में निर्वासन का जीवन जी रहे थे। सत्ता परिवर्तन के बाद खालिदा जिया को रिहा किया गया और लंबे समय बाद तारिक रहमान भी लंदन से ढाका लौटे। उन्होंने ऐसे समय में पार्टी की कमान संभाली, जब उनकी मां गंभीर रूप से बीमार थीं और कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया। इस घटना ने तारिक रहमान के सामने भावनात्मक और राजनीतिक, दोनों तरह की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी।

करीब 17–18 साल देश से दूर रहने के बाद तारिक रहमान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह मौजूदा बांग्लादेश और उसकी बदली हुई पीढ़ी की नब्ज को सही तरह समझ पाएंगे। हालांकि मां के निधन के बाद सहानुभूति फैक्टर और अवामी लीग के विकल्प के अभाव का फायदा उन्हें मिलता दिख रहा है, लेकिन यह भी सच है कि इतने लंबे अंतराल में देश की राजनीति और समाज काफी बदल चुका है।

चुनाव प्रचार में तारिक रहमान ने पूरी ताकत झोंक दी है। उन्होंने “Bangladesh Before All” का नारा दिया और पार्टी का चुनावी घोषणापत्र भी जारी किया। बीएनपी 300 में से 292 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि 8 सीटें सहयोगी दलों को दी गई हैं। तारिक रहमान खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। चुनाव के दौरान कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों और राजनयिकों ने उनसे मुलाकात भी की, जिससे उनकी वैश्विक स्वीकार्यता का संकेत मिलता है। अपने वादों में उन्होंने छात्र आंदोलन की प्रमुख मांग रहे जुलाई नेशनल चार्टर को लागू करने, मुक्ति आंदोलन के सही इतिहास को शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल करने, उप-राष्ट्रपति पद के सृजन, प्रधानमंत्री के कार्यकाल की अधिकतम सीमा तय करने, संसद में उच्च सदन बनाने, 2024 की हिंसा की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग गठित करने और पड़ोसी व मुस्लिम देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की बात कही है।

बीएनपी के सामने चुनौती भी कम नहीं है। जमात-ए-इस्लामी के साथ युवाओं की नई पार्टी एनसीपी का गठबंधन बना हुआ है, जिससे युवा वोट बैंक के बंटने की आशंका है। वहीं इस्लामी शासन के समर्थक जमात की ओर झुक सकते हैं। ऐसे में तारिक रहमान को संतुलन साधते हुए व्यापक जनसमर्थन जुटाना होगा।

इस चुनाव में एक अहम भूमिका शेख हसीना के समर्थकों की भी मानी जा रही है। मौजूदा हालात में अवामी लीग के समर्थकों के जमात-ए-इस्लामी के साथ जाने की संभावना बेहद कम है, क्योंकि 1971 के मुक्ति आंदोलन में जमात की भूमिका को लेकर गहरी नाराजगी रही है। ऐसे में इस वर्ग का समर्थन बीएनपी को मिल सकता है, जिससे तारिक रहमान को निर्णायक बढ़त मिल सकती है।

भारत के साथ संबंधों को लेकर भी दुनिया की नजरें इस चुनाव पर टिकी हैं। बांग्लादेश की आम जनता भारत के साथ मजबूत और सकारात्मक रिश्तों की समर्थक रही है। खालिदा जिया के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शोक संवेदना और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का ढाका जाकर अंतिम संस्कार में शामिल होना दोनों देशों के रिश्तों की अहमियत को दर्शाता है।

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