अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच छिड़ी खुली जंग: आधुनिक हथियारों पर भारी पड़ रही तालिबान की गुरिल्ला रणनीति

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव अब एक विनाशकारी मोड़ ले चुका है। पाकिस्तान द्वारा काबुल समेत कई अफगान शहरों पर किए गए भारी हवाई हमलों के बाद इसे आधिकारिक तौर पर ‘ओपन वॉर’ यानी खुली जंग घोषित कर दिया गया है।

काबुल/इस्लामाबाद: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र में गंभीर चिंता पैदा कर दी है। पाकिस्तान ने काबुल समेत कई अफगान शहरों पर हवाई हमले किए हैं और इसे खुली जंग की स्थिति बताया है। इसके जवाब में अफगान पक्ष ने सीमा चौकियों पर कब्जे और पाकिस्तानी सैनिकों के हताहत होने के दावे किए हैं। दोनों देशों की ओर से किए जा रहे दावों और प्रतिदावों के बीच जमीनी हालात जटिल और तनावपूर्ण बने हुए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आधुनिक हथियारों और परमाणु क्षमता से लैस पाकिस्तान को तालिबान जैसे असंगठित माने जाने वाले लड़ाके बार-बार चुनौती कैसे दे पाते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक इसका जवाब पारंपरिक सैन्य ताकत से अधिक जमीनी रणनीति और स्थानीय परिस्थितियों में छिपा है।

पाकिस्तान के पास उन्नत लड़ाकू विमान, टैंक, मिसाइल सिस्टम और संगठित सैन्य ढांचा है। हालिया हमलों में उसने काबुल, कंधार और पकतिया जैसे क्षेत्रों में एयरस्ट्राइक करने और बड़ी संख्या में लड़ाकों को मार गिराने का दावा किया है। इसके विपरीत तालिबान पारंपरिक सेना की तरह खुले मोर्चे पर लड़ने के बजाय छोटे, फुर्तीले समूहों में गुरिल्ला रणनीति अपनाता है। हिट-एंड-रन हमले, रात के समय कार्रवाई और सीमित लेकिन मोबाइल हथियारों का इस्तेमाल बड़ी सेना को उलझाए रखने में मदद करता है।

संघर्ष का बड़ा हिस्सा डूरंड लाइन के आसपास के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में केंद्रित है। नंगरहार, पकतीका और खोस्त जैसे क्षेत्रों का कठिन भूगोल बड़ी सैन्य टुकड़ियों की आवाजाही को धीमा कर देता है। ऐसे इलाकों में एयरस्ट्राइक का प्रभाव सीमित हो सकता है, जबकि स्थानीय लड़ाकों को गुफाओं, जंगलों और पहाड़ियों में छिपने का अवसर मिल जाता है। यही भौगोलिक परिस्थितियां लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष को जटिल बनाती हैं।

इसके अलावा सीमा के दोनों ओर फैले पश्तून समुदाय का सामाजिक समीकरण भी अहम माना जाता है। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि सीमाई क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों से तालिबान को रसद और आश्रय जैसे समर्थन मिलते रहे हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि मुश्किल है, लेकिन स्थानीय सामाजिक ढांचे का प्रभाव किसी भी सीमा संघर्ष में निर्णायक हो सकता है।

दूसरी ओर पाकिस्तान की अपनी रणनीतिक सीमाएं भी चुनौती पैदा करती हैं। लंबी सीमा रेखा पर फैली चौकियां, छोटे-छोटे मॉड्यूल में सक्रिय लड़ाके और स्थानीय जटिलताएं निर्णायक बढ़त हासिल करना कठिन बना देती हैं। साथ ही दोनों पक्षों के दावों में अंतर और सूचना युद्ध की स्थिति हालात को और उलझा रही है।

सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक हथियार और तकनीकी बढ़त महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में भूगोल, स्थानीय समर्थन और लड़ाई की शैली भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभाते हैं। डूरंड लाइन पर बढ़ता तनाव पहले से संवेदनशील रिश्तों को और अस्थिर दिशा में ले जा सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।

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