Mokshada Ekadashi Vrat 2025: मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है और इस वर्ष यह शुभ तिथि आज पड़ रही है। इस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है, इसलिए इसका आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है। शास्त्रों में माना गया है कि इस व्रत के पालन से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है और भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस दिन किया गया व्रत और पूजा पितरों को मुक्ति देता है, इसलिए भक्त विशेष रूप से भगवान विष्णु को समर्पित यह व्रत रखकर अपने पूर्वजों की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।
मोक्षदा एकादशी का महत्व
विष्णु पुराण और पद्म पुराण में मोक्षदा एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। यह व्रत मनोकामना पूर्ति, पाप से मुक्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत रखने से अनेक जन्मों के पाप भी मिट जाते हैं। यह मन को सत्त्वगुणी बनाती है, जिससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। मोक्षदा एकादशी का व्रत रखने से ग्रहों का अनुकूल प्रभाव पड़ता है और सभी दुख व कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत के प्रभाव से पितृ दोष समाप्त होता है और पूर्वजों को शांति मिलती है। जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है, वह तीर्थस्नान, दान, यज्ञ और तपस्या के बराबर फल प्राप्त करता है।
मोक्षदा एकादशी 2025 की तिथियाँ और शुभ समय
- कादशी तिथि प्रारंभ: 30 नवंबर, रात 9 बजकर 29 मिनट से
- एकादशी तिथि समापन: 1 दिसंबर, शाम 7 बजकर 1 मिनट तक
- उदया तिथि को मानते हुए मोक्षदा एकादशी का व्रत आज, 1 दिसंबर को किया जा रहा है।
- पारण समय: मोक्षदा एकादशी का पारण 2 दिसंबर को सुबह 6:57 बजे से 9:03 बजे के बीच किया जाएगा। पारण हमेशा शुभ मुहूर्त में ही किया जाता है।
मोक्षदा एकादशी 2025 शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:08 बजे से सुबह 06:02 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:49 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 05:21 बजे से शाम 05:48 बजे तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 01:55 बजे से दोपहर 02:37 बजे तक
मोक्षदा एकादशी पूजा विधि
- रात्रि में श्रीहरि नाम कीर्तन व जागरण करना अत्यंत शुभ माना गया है।
- आज ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान व ध्यान से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र पहनें और हाथ में अक्षत रखकर व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और हर जगह गंगाजल से छिड़काव करें।
- विष्णु जी को पीले फूल, तुलसी पत्र, पंचामृत और पीले वस्त्र अर्पित करें। फिर चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें।
- एकादशी के दिन 21 तुलसी दल भगवान विष्णु को अवश्य अर्पित करें, क्योंकि श्रीहरि की पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है।
- तुलसी की माला से ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें।
- देसी घी के दीपक से भगवान विष्णु की आरती करें।
- दिनभर व्रत रखें, आप फलाहार या निर्जला व्रत रख सकते हैं।
मंत्र
- सामान्य मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और ॐ नमो नारायणाय
- विष्णु गायत्री मंत्र: ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्
- शांताकारं मंत्र: शांताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभांगम्। लक्ष्मीकांतं कमल नयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।
मोक्षदा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, चंपकनगर नाम के राज्य में वैखानस नामक राजा राज्य करता था। इस राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे। एक बार राजा को बुरा सपना आया। उसने देखा कि उसके पूर्वज नरक में पड़े हैं और नरक से निकालने की गुहार लगा रहे थे। इस सपने को देख राजा बेहद दुखी और बेचैन हुआ। राजा ने ब्राह्मणों को इस सपने के बारे में बताया और पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए।
ब्राह्मणों ने बताया कि यहीं पास में पर्वत ऋषि का आश्रम है, जो भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता हैं। आपकी समस्या का समाधान ऋषि जरूर करेंगे। ब्राह्मणों की आज्ञा का पालन कर राजा ऋषि मुनि के आश्रम में पहुँचा और ऋषि को सपने के बारे में बताया। राजा ने कहा कि मेरे पूर्वज नरक भोग रहे हैं और मैं असहाय महसूस कर रहा हूँ, मैं उनको नरक से कैसे निकालूँ। ऋषि ने राजा को मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इस व्रत को करने से पितर नरक से मुक्त हो जाएंगे। इसके बाद राजा ने विधिपूर्वक मोक्षदा एकादशी व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के पूर्वज बुरे कर्मों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त हुए।
विष्णुजी की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥
