मतदाता सूची में नाम जोड़ने पर सुप्रीम कोर्ट में SIR विवाद, CJI सूर्यकांत ने कपिल सिब्बल की दलीलों पर जताई असहमति

Supreme Court SIR Hearing: याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें शुरू करते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया ने लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर बुनियादी चिंताएं पैदा की हैं और यह एक ऐसा मामला है जो सीधे तौर पर लोकतंत्र को प्रभावित करता है।

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Supreme Court SIR Hearing: सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मामले पर अंतिम सुनवाई शुरू हुई। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मतदाता सूची में संशोधन करने के निर्वाचन आयोग के निर्णय की वैधानिकता और वैधता के बड़े मुद्दे पर सुनवाई की।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें शुरू करते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया ने लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर बुनियादी चिंताएं पैदा की हैं और यह एक ऐसा मामला है जो सीधे तौर पर लोकतंत्र को प्रभावित करता है। सिब्बल ने दलील दी कि ‘आधार’ निवास स्थापित करता है, और भले ही यह नागरिकता का निर्णायक प्रमाण न हो, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण धारणा का आधार जरूर बनाता है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि एसआईआर आम मतदाताओं पर, जिनमें से कई निरक्षर हैं, फॉर्म भरने का असंवैधानिक बोझ डालता है और ऐसा न करने पर उन्हें बहिष्कृत किए जाने का जोखिम रहता है। उन्होंने न्यायालय से प्रक्रियात्मक औचित्य के बजाय संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया।

इस पर, पीठ ने कई तीखी टिप्पणियाँ कीं। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाला फॉर्म-6 निर्वाचन आयोग को यह बाध्य नहीं कर सकता कि वह बिना सत्यापन के हर प्रविष्टि स्वीकार करे। पीठ ने सिब्बल की एक दलील से असहमति जताते हुए कहा, “आप कह रहे हैं कि निर्वाचन आयोग एक डाकघर है, जिसे प्रस्तुत किए गए फॉर्म 6 को स्वीकार करना चाहिए और आपका नाम शामिल करना चाहिए।”

सीजेआई सूर्यकांत ने आधार के उपयोग पर सवाल उठाते हुए कहा, “आधार लाभ प्राप्त करने के लिए क़ानून द्वारा बनाया गया एक प्रावधान है। क्या सिर्फ इसलिए कि किसी व्यक्ति को राशन के लिए आधार दिया गया, उसे मतदाता भी बना दिया जाना चाहिए? मान लीजिए कोई पड़ोसी देश का निवासी है और मजदूरी करता है?” पीठ ने यह भी दोहराया कि आधार कार्ड ‘नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं देता है’। न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि मृत मतदाताओं को सूची से हटाने की आवश्यकता है और ग्राम पंचायतों तथा आधिकारिक पोर्टलों पर प्रकाशित सूचियों का उद्देश्य ही सार्वजनिक निगरानी के माध्यम से त्रुटियों को सुधारना है।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि यह तर्क कि देश में पहले कभी एसआईआर की कवायद नहीं हुई, उन राज्यों में इस प्रक्रिया को शुरू करने के निर्वाचन आयोग के फैसलों की वैधता पर सवाल उठाने का आधार नहीं बन सकता।

शीर्ष अदालत ने अब तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई का कार्यक्रम तय कर दिया है। निर्वाचन आयोग को तमिलनाडु मामले में 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करना है, और याचिकाएं 4 दिसंबर को सूचीबद्ध होंगी। केरल में एसआईआर के खिलाफ याचिकाओं पर निर्वाचन आयोग को 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करना होगा और सुनवाई 2 दिसंबर को होगी। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के खिलाफ याचिकाओं पर 9 दिसंबर को सुनवाई होगी, जिसके लिए निर्वाचन आयोग को सप्ताहांत में जवाब दाखिल करना है।

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