UGC Anti-Discrimination Rules: उच्चतम न्यायालय आज विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के उन नए ‘भेदभाव विरोधी नियमों’ की वैधता की समीक्षा करेगा, जिन्होंने देशभर के छात्र समुदायों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गई है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि ये नए नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ असमान व्यवहार करते हैं और उन्हें सुरक्षा के दायरे से बाहर रखते हैं। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका की तकनीकी खामियों को दूर कर तुरंत सुनवाई की सहमति जताई है।
यूजीसी के नए नियम क्या कहते हैं?
यूजीसी द्वारा लाए गए इन नए नियमों के तहत अब प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज में ‘समानता समितियों’ (Equity Committees) का गठन अनिवार्य कर दिया गया है। इन समितियों की संरचना में ओबीसी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं और दिव्यांगों के प्रतिनिधियों का होना अनिवार्य है। इन समितियों का प्राथमिक उद्देश्य परिसर में होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव की शिकायतों की जांच करना और एक समावेशी माहौल तैयार करना है। ये नियम 2012 के पुराने दिशा-निर्देशों का स्थान लेंगे, जो केवल सलाह के रूप में थे, जबकि नए नियम दंडात्मक और अनिवार्य प्रकृति के हैं।

नियमों के दुरुपयोग की आशंका
विवाद का मुख्य केंद्र इन नियमों के संभावित दुरुपयोग और इसकी संरचना है। याचिकाकर्ताओं और आलोचकों का आरोप है कि नए ढांचे में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी संभावित पीड़ितों की श्रेणी में जोड़ा गया है, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कोई सुरक्षात्मक प्रावधान नहीं रखा गया है। प्रदर्शनकारी छात्रों का दावा है कि इस तरह का वर्गीकरण सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वाभाविक रूप से ‘दोषी’ के रूप में चित्रित करता है और उनके खिलाफ शिकायतों के दुरुपयोग की गुंजाइश बनाता है। इसी असंतोष के कारण दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में व्यापक छात्र प्रदर्शन देखने को मिले हैं।

विरोध प्रदर्शन और सरकार की प्रतिक्रिया
इस बढ़ते तनाव के बीच केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए छात्रों को आश्वस्त करने का प्रयास किया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट किया है कि इन नियमों का उद्देश्य केवल समानता सुनिश्चित करना है, न कि किसी विशेष वर्ग को निशाना बनाना। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि इन कड़े प्रावधानों का गलत इस्तेमाल न हो। फिलहाल सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, क्योंकि अदालत का फैसला यह तय करेगा कि शिक्षण संस्थानों में सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
