सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देश की सड़कों पर आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और उनसे होने वाली मौतों पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि प्रशासन की लापरवाही के कारण यह समस्या अब हजार गुना बढ़ चुकी है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि कुत्तों के काटने से किसी बच्चे या बुजुर्ग की मौत होती है या वे घायल होते हैं, तो इसके लिए राज्य सरकार को भारी मुआवजा देना होगा।
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने उन लोगों की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए जो सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाते हैं। उन्होंने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जिन्हें कुत्तों को खाना खिलाने का इतना शौक है, वे उन्हें अपने घर ले जाएं। कुत्तों को सड़कों पर इस तरह नहीं छोड़ा जाना चाहिए कि वे लोगों को डराएं या काटें। यह टिप्पणी तब आई जब पशु-कल्याण ट्रस्टों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने इस मुद्दे को भावनात्मक बताया। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि अभी तक तो भावनाएं सिर्फ कुत्तों के प्रति ही दिखाई दे रही हैं।
अदालत में बहस के दौरान जब गुरुस्वामी ने संसद की बहसों का हवाला दिया, तो जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की कि संसद ‘एलीट क्लास’ है। पीठ ने इस बात पर भी असंतोष जताया कि कोर्ट रूम अब न्यायिक कार्यवाही के बजाय एक सार्वजनिक मंच बनता जा रहा है। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता ने स्थिति को बदतर बना दिया है और अब प्रशासन को जवाबदेह ठहराने के लिए आदेश पारित करने का समय आ गया है।
वहीं, वकील मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि कुत्तों को मारना इस समस्या का समाधान नहीं है और नसबंदी (Sterilisation) ही एकमात्र सही तरीका है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के फंड का सही उपयोग नहीं हो रहा है और ‘एनिमल बर्थ कंट्रोल’ (ABC) नियम जानवरों को क्रूरता से बचाने के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी तर्क कुत्तों के सफाए या उनके प्रति क्रूरता को सही नहीं ठहरा सकता और नसबंदी की नीति को सही ढंग से लागू करने की आवश्यकता है।
