UGC Protest: कानपुर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए ‘इक्विटी नियमों’ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन ने अब एक बेहद गंभीर और भावनात्मक मोड़ ले लिया है। अलीगढ़ की घटना के बाद अब कानपुर में सनातन मंदिर रक्षा समिति से जुड़े आकाश ठाकुर ने अस्पताल में अपना खून निकलवाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने यूजीसी के नए नियमों को वापस लेने या उनमें तत्काल संशोधन करने की पुरजोर मांग की है। आकाश ठाकुर का कहना है कि सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों से बात न सुने जाने के कारण उन्हें यह कठोर कदम उठाना पड़ा ताकि सरकार का ध्यान इस गंभीर विषय की ओर आकर्षित किया जा सके।
प्रदर्शनकारियों की मुख्य आपत्ति यूजीसी के नए नियमों के सेक्शन 3(C) को लेकर है। आकाश ठाकुर ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि हालांकि यह नियम जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लाया गया है, लेकिन इसका मौजूदा स्वरूप सवर्ण समाज के अधिकारों के खिलाफ प्रतीत होता है। उनका आरोप है कि यह नियम शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन पैदा करेगा और समाज के सभी वर्गों के साथ समान न्याय करने में विफल रहेगा। आलोचकों का मानना है कि इन प्रावधानों के कारण सामान्य वर्ग को जानबूझकर सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा गया है, जो सामाजिक समरसता के लिए ठीक नहीं है।
इस मामले में अब कानूनी लड़ाई भी तेज हो गई है। यूजीसी के इन नियमों को जनहित याचिका (PIL) के जरिए अदालत में चुनौती दी गई है, जिसमें विशेष रूप से सेक्शन 3(C) को असंवैधानिक और समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि कोई भी नियम जो केवल एक पक्षीय दृष्टिकोण रखता हो, वह लोकतांत्रिक ढांचे में स्वीकार्य नहीं हो सकता। कानपुर के इस ‘रक्त पत्र’ आंदोलन के बाद अब अन्य जिलों में भी इसी तरह के प्रदर्शनों और ज्ञापनों की तैयारी की जा रही है।
विरोध कर रहे संगठनों और छात्रों की स्पष्ट मांग है कि सरकार शिक्षा नीति में ऐसी विसंगतियों को दूर करे जो समाज में नई खाई पैदा कर सकती हैं। उनका कहना है कि शिक्षण संस्थानों में नियम ऐसे होने चाहिए जो बिना किसी भेदभाव के सभी छात्रों को समान अवसर और सुरक्षा प्रदान करें। फिलहाल, प्रधानमंत्री को भेजे गए इस पत्र और देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह इन नियमों पर क्या रुख अपनाती है।
