अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत ने चाबहार पोर्ट से पीछे हटने का निर्णय लिया

भारत और ईरान के बीच साल 2024 में हुआ ऐतिहासिक 10 वर्षीय समझौता अब अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक भू-राजनीति की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। इस समझौते के तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड को ईरान के चाबहार पोर्ट में ‘शाहिद बेहेश्ती’ टर्मिनल को विकसित करने और चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

India Pulls Back from Chabahar Port Amid US Sanctions
India Pulls Back from Chabahar Port Amid US Sanctions

भारत और ईरान के बीच साल 2024 में हुआ ऐतिहासिक 10 वर्षीय समझौता अब अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक भू-राजनीति की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। इस समझौते के तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) को ईरान के चाबहार पोर्ट में ‘शाहिद बेहेश्ती’ टर्मिनल को विकसित करने और चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। यह बंदरगाह भारत के लिए सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक पहुंचने का एक सीधा रास्ता (INSTC कॉरिडोर) प्रदान करता है। भारत ने इस परियोजना में करीब 4,000 करोड़ रुपये का निवेश भी किया है।

इस पूरी परियोजना पर संकट के बादल सितंबर 2025 में तब मंडराने लगे जब अमेरिका ने ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लागू कर दिए। हालांकि साल 2018 में भारत को इस बंदरगाह के लिए विशेष छूट मिली थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इसे रद्द कर दिया। अमेरिका के ‘ऑफिस ऑफ फॉरेन असेट्स कंट्रोल’ (OFAC) ने भारत को अपनी गतिविधियों को समेटने के लिए अक्टूबर 2025 से अप्रैल 2026 तक की 6 महीने की मोहलत दी है। इसके तुरंत बाद, 12 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी, जिसने भारत पर दबाव को और अधिक बढ़ा दिया।

इन प्रतिबंधों के प्रभाव से बचने के लिए भारत ने चाबहार से पीछे हटने की प्रक्रिया तेज कर दी है। इसके तहत IPGL के बोर्ड से सरकारी निदेशकों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया है और कंपनी की वेबसाइट भी बंद कर दी गई है ताकि संबंधित लोग अमेरिकी रडार पर न आएं। भारत ने 120 मिलियन डॉलर का बकाया और कर्ज चुका कर वहां से पूरी तरह बाहर निकलने का मन बना लिया है। भारत के लिए यह फैसला आर्थिक हितों की रक्षा के लिए लिया गया एक व्यावहारिक कदम माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका के साथ भारत का व्यापारिक रिश्ता ईरान की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है।

चाबहार पोर्ट से पीछे हटना भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका भी है। यह बंदरगाह पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित ग्वादर पोर्ट का एक प्रभावी जवाब था और अफगानिस्तान को मानवीय सहायता पहुंचाने का प्रमुख जरिया भी। वर्तमान में ईरान के भीतर चल रहे बड़े विरोध प्रदर्शनों ने वहां की स्थिति को और अधिक अस्थिर कर दिया है। ऐसी स्थिति में भारत अब मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए अन्य वैकल्पिक रास्तों और विकल्पों पर विचार कर रहा है ताकि अपने दीर्घकालिक व्यापारिक हितों को सुरक्षित रख सके।

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