CGHS Scam: दिल्ली की एक अदालत ने करोड़ों रुपये के कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी (CGHS) घोटाले में दोषी पाए गए 13 लोगों को सजा सुनाई है। इनमें एक 84 वर्षीय रिटायर्ड IAS अफसर गोपाल दीक्षित भी शामिल हैं। अदालत ने इस मामले में भ्रष्टाचार को समाज का “कैंसर” बताते हुए कहा कि इसे मिटाने के लिए “कीमोथेरेपी जैसी कठोर सजा” देना आवश्यक है।
यह मामला सफदरजंग कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी घोटाले से जुड़ा है। आरोपियों ने मृतप्राय सोसाइटियों को सक्रिय दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए और दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) से अवैध रूप से जमीन हासिल की। इसके बाद उन्होंने उन जमीनों पर फ्लैट्स बनाकर उन्हें नए खरीदारों और एजेंट्स को भारी रकम पर बेच दिया। इस फर्जीवाड़े ने हजारों लोगों के सपनों पर पानी फेर दिया — जिनमें से कई अपने घर की EMI आज भी चुका रहे हैं।
सीबीआई जांच में खुलासा हुआ कि इस तरह के 135 से अधिक फर्जी सोसाइटीज़ बनाई गई थीं, जिनके माध्यम से लोगों को करोड़ों का चूना लगाया गया।
अदालत ने 13 अक्टूबर को सभी आरोपियों को दोषी ठहराया था और 31 अक्टूबर को सजा सुनाई। जिन आरोपियों को 5 साल की सजा और जुर्माना मिला है, उनमें कर्मवीर सिंह, नरेंद्र कुमार, महा नैन शर्मा, पंकज मदान, अहवनी शर्मा, आशुतोष पंत, सुदर्शन टंडन, मनोज वत्स, विजय ठाकर, विकास मदान और पूनम अवस्थी शामिल हैं। वहीं, 84 वर्षीय रिटायर्ड IAS गोपाल दीक्षित और 92 वर्षीय नरेंद्र धीर को 2 साल की सजा और जुर्माना लगाया गया है।
सीबीआई ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं के तहत आरोप लगाए थे, जिनमें साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी शामिल हैं। इसके साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।
स्पेशल जज प्रशांत शर्मा ने फैसले में कहा, “भ्रष्टाचार लोकतंत्र और सामाजिक व्यवस्था का शत्रु है। यह न केवल अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि देश की नैतिक और सांस्कृतिक विरासत को भी नष्ट करता है। अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो समाज में अराजकता फैल जाएगी।”
दोषियों ने अदालत से दया की गुहार लगाई, यह कहते हुए कि उनके परिवार की जिम्मेदारी उन पर है। लेकिन अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “अगर परिवार की चिंता थी, तो अपराध क्यों किया?”
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस साजिश का उद्देश्य दिल्ली की सस्ती जमीन और प्रॉपर्टी पर कब्जा करना था — चाहे इसके लिए जालसाजी और भ्रष्टाचार की हदें क्यों न पार करनी पड़ें।
इस फैसले को न्यायपालिका का एक सशक्त संदेश माना जा रहा है कि भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे आरोपी कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों।
