स्वदेशी तकनीक से बनी स्लीपर वंदे भारत ट्रेन, एक कोच मात्र 8.5 करोड़ में तैयार

Vande Bharat Sleeper train: देश की पहली स्लीपर वंदे भारत ट्रेन अब पटरी पर उतरने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस ट्रेन के दो रेक बनकर तैयार हो चुके हैं और इन्हें सभी जरूरी परीक्षणों के साथ-साथ सीआरएस (कमीशन ऑफ रेलवे सेफ्टी) की मंजूरी भी मिल चुकी है।

Vande Bharat Sleeper Coach Developed in India, Cost Per Coach ₹8.5 Crore
Vande Bharat Sleeper Coach Developed in India, Cost Per Coach ₹8.5 Crore

देश की पहली स्लीपर वंदे भारत ट्रेन अब पटरी पर उतरने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस ट्रेन के दो रेक बनकर तैयार हो चुके हैं और इन्हें सभी जरूरी परीक्षणों के साथ-साथ सीआरएस (कमीशन ऑफ रेलवे सेफ्टी) की मंजूरी भी मिल चुकी है। अब केवल प्रधानमंत्री द्वारा इसके आधिकारिक उद्घाटन का इंतजार है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस ट्रेन की प्रशंसा करते हुए इसे विश्व की सबसे बेहतरीन ट्रेनों में से एक बताया है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि भारत में निर्मित इस स्लीपर वंदे भारत की लागत मेट्रो ट्रेन से भी कम आ रही है, जो भारतीय इंजीनियरिंग के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।

स्वदेशी तकनीक से बनी इस स्लीपर वंदे भारत की आर्थिक मजबूती का अंदाजा इसके निर्माण खर्च से लगाया जा सकता है। वर्तमान में भारत में मेट्रो के एक कोच को तैयार करने में लगभग 10 करोड़ रुपये की लागत आती है, जबकि स्लीपर वंदे भारत का एक कोच मात्र 8.5 करोड़ रुपये में बनकर तैयार हो रहा है। यदि इसकी तुलना पारंपरिक मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों से करें, तो उनके सामान्य स्लीपर कोच करीब 2 करोड़ और एसी कोच 2.8 से 3 करोड़ रुपये में बनते हैं। हालांकि, वंदे भारत एक सेमी हाई-स्पीड ट्रेन है, इसलिए इसकी लागत सामान्य ट्रेनों से अधिक है, लेकिन अपनी श्रेणी की वैश्विक ट्रेनों के मुकाबले यह बेहद किफायती है।

वैश्विक स्तर पर तुलना की जाए तो पोलैंड, इटली, स्विट्जरलैंड और अन्य यूरोपीय देशों में 250 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाली सेमी हाई-स्पीड ट्रेनों के एक कोच की लागत 12 से 15 करोड़ रुपये के बीच आती है। वहीं, जापान में भी इस श्रेणी के कोच लगभग 15 करोड़ रुपये में तैयार होते हैं। इनके मुकाबले भारत की 8.5 करोड़ रुपये वाली स्लीपर वंदे भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत प्रतिस्पर्धी साबित हो रही है। यही कारण है कि रेल मंत्री ने भविष्य में भारत द्वारा इन ट्रेनों के बड़े स्तर पर निर्यात किए जाने की प्रबल संभावना जताई है।

2019 में दिल्ली से वाराणसी के बीच पहली सेमी हाई-स्पीड ट्रेन चलाने के बाद भारत ने इस क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई है। पूरी तरह स्वदेशी होने के कारण इसकी निर्माण लागत कम है और सुविधाएं विश्व स्तरीय हैं। सरकार अब इस दिशा में तेजी से काम कर रही है ताकि भारत आने वाले समय में सेमी हाई-स्पीड ट्रेनों के एक प्रमुख निर्यातक के रूप में उभरे। इससे न केवल वैश्विक स्तर पर बेहतर रेल सुविधाएं उपलब्ध होंगी, बल्कि भारत की विनिर्माण क्षमता का डंका भी पूरी दुनिया में बजेगा।

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