RBI Monetary Policy: रेपो रेट 5.25% पर बरकरार, बजट और भारत-अमेरिका ट्रेड डील के बीच गवर्नर संजय मल्होत्रा का बड़ा फैसला

RBI Monetary Policy: आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक के नतीजों की घोषणा करते हुए बताया कि रेपो रेट फिलहाल 5.25 प्रतिशत पर ही बना रहेगा। केंद्रीय बजट 2026 के बाद यह एमपीसी की पहली बैठक थी, जिस पर बाजार, निवेशकों और कर्जदारों की खास नजर बनी हुई थी।

RBI Monetary Policy: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को मौद्रिक नीति की समीक्षा के बाद रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला किया है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक के नतीजों की घोषणा करते हुए बताया कि रेपो रेट फिलहाल 5.25 प्रतिशत पर ही बना रहेगा। केंद्रीय बजट 2026 के बाद यह एमपीसी की पहली बैठक थी, जिस पर बाजार, निवेशकों और कर्जदारों की खास नजर बनी हुई थी। रेपो रेट में कोई बदलाव न होने से फिलहाल लोन की ब्याज दरों पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।

आरबीआई की यह तीन दिवसीय एमपीसी बैठक 4 फरवरी को शुरू हुई थी, जिसकी अध्यक्षता गवर्नर संजय मल्होत्रा ने की। बैठक से पहले ज्यादातर अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों का अनुमान था कि इस बार भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। दिसंबर 2025 में आरबीआई ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती की थी, जिससे यह संकेत मिला था कि केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास को समर्थन देना चाहता है।

नीति समीक्षा के बाद गवर्नर ने कहा कि पिछली बैठक के बाद वैश्विक स्तर पर बाहरी चुनौतियां बढ़ी हैं। हालांकि, हाल में हुए कुछ महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौतों का सफल समापन भारत के आर्थिक दृष्टिकोण के लिए सकारात्मक संकेत देता है। उन्होंने यह भी कहा कि निकट अवधि में देश में महंगाई और आर्थिक विकास का आउटलुक संतुलित और अनुकूल बना हुआ है। रेपो रेट के अपरिवर्तित रहने के साथ ही स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) की दर 5 प्रतिशत पर बनी रहेगी, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) और बैंक दर 5.5 प्रतिशत पर यथावत रहेंगी।

पिछले एक साल में आरबीआई रेपो रेट में कुल 125 बेसिस पॉइंट की कटौती कर चुका है। विशेषज्ञों का मानना था कि इतनी बड़ी कटौती के बाद केंद्रीय बैंक अब ‘वेट एंड वॉच’ यानी हालात को देखकर आगे कदम उठाने की रणनीति अपनाएगा। वैश्विक अनिश्चितता, विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव और सरकारी बॉन्ड यील्ड के स्थिर रहने जैसे कारकों के चलते आरबीआई इस समय किसी भी नई दर कटौती को लेकर सतर्क रुख अपना रहा है।

फरवरी की यह एमपीसी बैठक कई मायनों में अहम मानी जा रही थी। हाल ही में पेश हुए केंद्रीय बजट 2026 और भारत-अमेरिका के बीच हुए बड़े व्यापार समझौते से आर्थिक गतिविधियों और महंगाई पर असर पड़ने की संभावना है। ऐसे में बाजार की नजर सिर्फ रेपो रेट पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी थी कि आरबीआई आगे चलकर तरलता प्रबंधन और महंगाई तथा विकास के बीच संतुलन को कैसे साधता है।

रेपो रेट वह दर होती है जिस पर आरबीआई बैंकों को अल्पकालिक कर्ज देता है। जब रेपो रेट कम होता है तो बैंकों के लिए पैसा सस्ता हो जाता है और इसका फायदा आगे चलकर ग्राहकों और कंपनियों को कम ब्याज दरों के रूप में मिलता है। वहीं, दरों को स्थिर रखने का मतलब यह होता है कि केंद्रीय बैंक मौजूदा आर्थिक हालात से संतुष्ट है और पिछली दर कटौतियों के असर को समझने के लिए कुछ समय देना चाहता है।

बैंकों पर पिछली कटौतियों का असर धीरे-धीरे दिखाई दिया है। रिसर्च फर्मों के मुताबिक, कर्ज दरों में नरमी आई है और सरकारी बॉन्ड यील्ड भी काफी हद तक स्थिर बनी हुई हैं। आरबीआई पहले भी अर्थव्यवस्था को ‘गोल्डीलॉक्स फेज’ यानी न बहुत तेज, न बहुत धीमी, बल्कि संतुलित स्थिति में बता चुका है। मौजूदा नीति फैसला इसी संतुलन को बनाए रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

© 2026 Breaking News Wale - Latest Hindi News by Breaking News Wale