विश्व आर्थिक मंच की दावोस में जारी वार्षिक बैठक के दौरान यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच तनाव एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ग्रीनलैंड को लेकर दी गई टैरिफ की धमकी पर दोटूक शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने ट्रंप के इस संभावित कदम को एक बड़ी रणनीतिक गलती बताते हुए कहा कि यह दशकों पुरानी आपसी साझेदारी और भरोसे को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है।
उर्सुला ने अपने संबोधन में साफ किया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी व्यापार की तरह समझौतों की अहमियत होती है और जब दोस्त हाथ मिलाते हैं, तो उस वादे का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले साल जुलाई में दोनों पक्षों के बीच एक व्यापारिक सहमति बनी थी, जिसे तोड़ना कूटनीतिक मर्यादा के खिलाफ होगा।
यूरोपीय संघ की अध्यक्ष ने वैश्विक सुरक्षा के नजरिए से भी अमेरिका को आगाह किया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के लोग केवल सहयोगी नहीं बल्कि यूरोप के करीबी दोस्त हैं। ऐसे में एक-दूसरे को नीचा दिखाने या आर्थिक चोट पहुँचाने की कोशिशें केवल उन साझा दुश्मनों को मजबूत करेंगी जिन्हें दोनों पक्ष मिलकर वैश्विक पटल से दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं।
उर्सुला ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर ट्रंप टैरिफ थोपने के अपने फैसले पर आगे बढ़ते हैं, तो यूरोपीय संघ का जवाब पूरी तरह से एकजुट, अटल और समान स्तर का होगा। इस दौरान उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यूरोप अब अपनी सुरक्षा रणनीति को स्वतंत्र रूप से तैयार कर रहा है और ग्रीनलैंड सहित आर्कटिक क्षेत्र में अपनी भागीदारी और निवेश को बड़े पैमाने पर बढ़ाने जा रहा है।
इस पूरे विवाद की जड़ राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दी गई वह धमकी है जिसमें उन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर अपनी शर्तों पर समझौता न होने की स्थिति में यूरोपीय देशों पर भारी टैरिफ लगाने की बात कही है। ट्रंप ने घोषणा की है कि 1 फरवरी से डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और यूनाइटेड किंगडम जैसे कई प्रमुख देशों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क देना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब तक ग्रीनलैंड को लेकर कोई ठोस डील नहीं होती, वह इस योजना पर 100 प्रतिशत अडिग रहेंगे।
ट्रंप के इस रुख ने यूरोपीय देशों के बीच खलबली मचा दी है, जिसके जवाब में उर्सुला ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के लोगों के साथ खड़े होने का संकल्प दोहराया है और इसे एक प्रकार का आर्थिक दबाव बनाने की अनुचित कोशिश करार दिया है।
