अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने के बयानों ने एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। शनिवार, 17 जनवरी 2026 को ग्रीनलैंड की राजधानी नूक (Nuuk) में सैकड़ों लोग सड़कों पर उतरे और अमेरिका के संभावित कब्जे के दावों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। इस विरोध प्रदर्शन की सबसे खास बात यह रही कि इसकी अगुवाई खुद ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने की, जो यह साफ संकेत है कि वहां की सरकार और जनता इस मुद्दे पर एकमत हैं।
प्रदर्शनकारी अपने हाथों में ग्रीनलैंड के झंडे और बैनर लेकर अमेरिकी कॉन्सुलेट की ओर मार्च करते देखे गए। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि ग्रीनलैंड कोई संपत्ति नहीं जिसे खरीदा या कब्जाया जा सके, बल्कि उसे अपने भविष्य का फैसला खुद करने का पूरा अधिकार है। यह मार्च उस निर्माणाधीन ब्लॉक के पास से भी गुजरा जहाँ अमेरिका अपने कॉन्सुलेट को शिफ्ट करने की योजना बना रहा है। वर्तमान में अमेरिकी कॉन्सुलेट एक छोटी सी लकड़ी की इमारत से संचालित होता है, लेकिन ट्रंप की बढ़ती दिलचस्पी के बाद वहां अमेरिकी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैं।
ट्रंप की दलील और रणनीतिक महत्व
राष्ट्रपति ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति और वहां मौजूद प्रचुर खनिज भंडार अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य हैं। उन्होंने यहां तक संकेत दिया है कि इस क्षेत्र पर नियंत्रण पाने के लिए वे ‘बल प्रयोग’ के विकल्प से भी पीछे नहीं हटेंगे। ट्रंप के करीबी और व्हाइट हाउस के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर ने इस विवाद को और हवा देते हुए कहा है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड की रक्षा करने में असमर्थ है, इसलिए अमेरिका को आगे आना चाहिए।
NATO सहयोगियों के बीच दरार और सैन्य हलचल
ट्रंप के इन बयानों ने अमेरिका और डेनमार्क के बीच के रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर दी है, जबकि दोनों ही देश नाटो (NATO) के संस्थापक सदस्य हैं। डेनमार्क ने अमेरिकी दावों का जवाब देने के लिए ग्रीनलैंड में नाटो की स्थायी मौजूदगी बढ़ाने की योजना बनाई है। इसी कड़ी में इसी सप्ताह यूरोपीय देशों के सैन्य कर्मियों को ग्रीनलैंड में तैनात किया गया है। 57 हजार की आबादी वाला यह स्वायत्त क्षेत्र रक्षा और विदेश नीति के लिए डेनमार्क पर निर्भर है, लेकिन ट्रंप के बयानों ने स्थानीय लोगों को डेनमार्क के साथ और अधिक एकजुट कर दिया है।
अमेरिका के भीतर भी विरोध
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के इस विस्तारवादी प्लान को खुद अमेरिका के भीतर भी समर्थन नहीं मिल रहा है। ‘रॉयटर्स/Ipsos’ के हालिया सर्वे के अनुसार, 80 प्रतिशत अमेरिकी इस अधिग्रहण के पक्ष में नहीं हैं। केवल 10 प्रतिशत अमेरिकी ही ऐसे हैं जो ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए सेना के इस्तेमाल का समर्थन करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यूरोपीय देशों ने ट्रंप के इस रुख की कड़ी आलोचना की है, जिससे यह मुद्दा एक बड़े वैश्विक राजनयिक संकट में बदल गया है।
