नई दिल्ली: पिछले 12 सालों से एक बिस्तर पर बेजान पड़े हरीश राणा के जीवन और मृत्यु के संघर्ष पर आज देश की सर्वोच्च अदालत अपना अंतिम फैसला सुना सकती है। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा के बुजुर्ग माता-पिता ने अपने ही बेटे के लिए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छा मृत्यु) की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। माता-पिता का कहना है कि उनका बेटा 100 फीसदी दिव्यांगता का शिकार है और एक ‘जिंदा लाश’ की तरह जी रहा है, जिसे अब और कष्ट में देखना उनके लिए मुमकिन नहीं है।
इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच कर रही है। कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली के एम्स (AIIMS) से हरीश की स्वास्थ्य स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। एम्स की मेडिकल रिपोर्ट देखने के बाद पीठ ने गहरी निराशा और दुख व्यक्त किया था। जस्टिस पारदीवाला ने रिपोर्ट को ‘बेहद दुखद’ बताते हुए टिप्पणी की थी कि हरीश के ठीक होने की अब कोई उम्मीद नहीं बची है। कोर्ट ने स्वीकार किया कि किसी को इस तरह के अपार दर्द और अमानवीय स्थिति में रखना बहुत मुश्किल फैसला है, लेकिन अब वह उस निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुके हैं जहाँ अंतिम निर्णय लेना अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस भावुक और कानूनी रूप से जटिल मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए 13 जनवरी को हरीश के माता-पिता को व्यक्तिगत रूप से कमेटी रूम में बुलाया था। कोर्ट का मानना था कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ऐसे गंभीर विषय पर चर्चा करना सही नहीं होगा। एडिशनल सॉलिसीटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और याचिकाकर्ता की वकील रश्मि नंदकुमार को निर्देश दिए गए थे कि वे परिवार से विस्तार से बात करें और उन्हें मेडिकल रिपोर्ट की हकीकत से अवगत कराएं।
आज होने वाला फैसला न केवल हरीश राणा के परिवार के लिए निर्णायक होगा, बल्कि भारत में ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ (सम्मान के साथ मरने का अधिकार) और पैसिव यूथेनेशिया के कानूनों के भविष्य के लिए भी एक बड़ी मिसाल पेश करेगा। बूढ़े माता-पिता, जिन्होंने 12 साल तक अपने बच्चे की सेवा की, अब भारी मन से अदालत की ओर देख रहे हैं ताकि उनके बेटे को इस अंतहीन पीड़ा से मुक्ति मिल सके।
