केंद्र सरकार द्वारा बड़े डिजिटल लेन-देन यानी UPI ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने की घोषणा के बाद से ही पूरे देश में बहस छिड़ गई है। जहां एक तरफ वित्तीय क्षेत्र के कुछ विशेषज्ञ इसे एक सराहनीय और आर्थिक रूप से संतुलित कदम मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम लोगों और छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ने का हवाला देकर इस निर्णय की कड़ी आलोचना भी की जा रही है। इसी बीच नीति आयोग के वाइस चेयरमैन अशोक कुमार लाहिड़ी का एक बयान सामने आया है, जिसने इस पूरे मुद्दे को और चर्चा में ला दिया है।
सरकार चलाने के लिए टैक्स और फीस जरूरी: अशोक लाहिड़ी
नीति आयोग के वाइस चेयरमैन अशोक कुमार लाहिड़ी ने सरकार के इस कदम का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी सरकार बिना टैक्स या शुल्क वसूले अनिश्चितकाल तक नहीं चलाई जा सकती। लाहिड़ी ने तर्क दिया कि सरकार हर ट्रांजैक्शन पर हमेशा के लिए सब्सिडी जारी नहीं रख सकती और लोगों को व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए न्यूनतम लागत देनी ही चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है और इसे नीति आयोग का आधिकारिक रुख न माना जाए।
चाणक्य नीति का दिया उदाहरण
अपनी बात को गहराई से समझाने के लिए अशोक लाहिड़ी ने प्राचीन अर्थशास्त्री और नीतिशास्त्री चाणक्य की नीतियों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि एक कुशल राजा को अपनी प्रजा से कर (टैक्स) ठीक उसी संवेदनशीलता के साथ वसूलना चाहिए, जैसे एक मधुमक्खी फूल को बिना कोई नुकसान पहुंचाए या उसे चोट पहुँचाए उससे धीरे-धीरे शहद इकट्ठा करती है।
चेकबुक सेवा से तुलना और मामूली शुल्क का तर्क
न्यूज़ 18 की एक रिपोर्ट के अनुसार, लाहिड़ी ने इस नए शुल्क की तुलना बैंक द्वारा दी जाने वाली अन्य सामान्य सेवाओं, जैसे चेकबुक जारी करने पर लगने वाले चार्ज से की। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 100 रुपये के बड़े लेन-देन पर व्यक्ति को केवल 40 पैसे ही देने पड़ते हैं, वह भी सिर्फ बड़े स्तर के ट्रांजैक्शन पर। उन्होंने सवाल उठाया कि इतने मामूली चार्ज से किसी पर अचानक बड़ा संकट नहीं आ जाएगा। डिजिटल भुगतान की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इसकी संचालन लागत देना आवश्यक है और समय के साथ लोगों को इसकी आदत हो जाएगी।
क्या है सरकार का UPI शुल्क से जुड़ा नया प्लान?
केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई नई व्यवस्था के अनुसार, आगामी 15 अक्टूबर से व्यापारियों को किए जाने वाले 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लागू किया जाएगा। यह 0.4 प्रतिशत शुल्क केवल ‘व्यक्ति-से-व्यापारी’ (Person-to-Merchant यानी P2M) प्रकार के लेन-देन पर ही लगेगा। आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों को राहत देते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि 2,000 रुपये तक के किसी भी यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। इसके अलावा, यह लागू होने वाला शुल्क सीधे व्यापारियों द्वारा ही देय होगा।
अधिसूचना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दर्ज
सरकार के इस फैसले का विरोध अब अदालत के दरवाजे तक पहुंच गया है। शीर्ष अदालत में अधिवक्ता अंजन दत्ता द्वारा एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें केंद्र सरकार की 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित एमडीआर व्यवस्था को सीधे चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह नया नियम बिना किसी पर्याप्त कानूनी सुरक्षा, आवश्यक पारदर्शिता और आम जनता से परामर्श किए बिना जल्दबाज़ी में लागू किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह व्यवस्था पूरी तरह मनमानी और भेदभावपूर्ण है, जिसका सबसे बड़ा और बुरा असर कम मार्जिन पर काम करने वाले छोटे कारोबारियों पर पड़ेगा। इसके साथ ही याचिका में आशंका जताई गई है कि इस कदम से अप्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ताओं पर अनदेखा आर्थिक बोझ पड़ेगा और देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल भुगतान अभियान को झटका लग सकता है।
