Mahesh Navami 2026: कब मनाई जाएगी महेश नवमी? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में भगवान शिव को कल्याण और मंगल के देवता माना जाता है। उन्हें महादेव, महेश, महेश्वर, भोलेनाथ, नीलकंठ और औघड़दानी जैसे अनेक नामों से पूजा जाता है। भगवान शिव से जुड़े प्रमुख पर्वों में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर मनाई जाने वाली महेश नवमी का विशेष महत्व है।

महेश नवमी 2026 (Image: ChatGPT)
महेश नवमी 2026 (Image: ChatGPT)

Mahesh Navami 2026: हिंदू धर्म में भगवान शिव को कल्याण और मंगल के देवता माना जाता है। उन्हें महादेव, महेश, महेश्वर, भोलेनाथ, नीलकंठ और औघड़दानी जैसे अनेक नामों से पूजा जाता है। भगवान शिव से जुड़े प्रमुख पर्वों में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर मनाई जाने वाली महेश नवमी का विशेष महत्व है। यह पर्व विशेष रूप से माहेश्वरी समाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद से हुई थी।

महेश नवमी 2026 कब है?

पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 22 जून 2026 को सायंकाल 3 बजकर 39 मिनट पर प्रारंभ होगी और 23 जून 2026 को शाम 4 बजकर 39 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर महेश नवमी का पर्व 23 जून 2026, मंगलवार को मनाया जाएगा।

महेश नवमी पूजा विधि

महेश नवमी के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान शिव का स्मरण करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा का संकल्प लें। इसके बाद भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें।

पूजा के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती को फल, फूल, धूप, दीप, अक्षत, भांग, धतूरा, दूध, दही और पंचामृत अर्पित करें। शिव चालीसा का पाठ करें और भगवान शिव के मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें। पूजा के अंत में आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि तथा कल्याण की कामना करें। संध्या समय पुनः आरती करने के बाद फलाहार ग्रहण करें और अगले दिन व्रत का पारण करें।

महेश नवमी की कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माहेश्वरी समाज के पूर्वज मूल रूप से क्षत्रिय वंश से संबंधित थे। प्राचीन समय में खड्गलसेन नाम के एक प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा राज्य करते थे। उनकी प्रजा सुखी और समृद्ध थी, लेकिन संतान न होने का दुख उन्हें हमेशा रहता था।

संतान प्राप्ति की इच्छा से राजा ने कामेष्टि यज्ञ करवाया, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम सुजान कंवर रखा गया। जब सुजान युवा हुआ तो एक दिन अपने मित्रों के साथ शिकार के लिए वन गया। वहां अनजाने में उसके द्वारा ऋषियों के यज्ञ में विघ्न उत्पन्न हो गया।

इससे क्रोधित होकर ऋषियों ने सुजान और उसके साथियों को श्राप दे दिया, जिसके प्रभाव से वे पत्थर में परिवर्तित हो गए। इसके बाद राजकुमार की पत्नी ने ऋषियों से क्षमा याचना की। ऋषियों ने उन्हें भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करने का मार्ग बताया।

कठोर तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और सुजान सहित 72 वीरों को पुनर्जीवित कर दिया। साथ ही उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा कि आगे से उनका वंश माहेश्वरी कहलाएगा और उन पर भगवान महेश्वर की विशेष कृपा बनी रहेगी। तभी से माहेश्वरी समाज भगवान शिव को अपना आराध्य मानते हुए महेश नवमी का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाता है।

महेश नवमी का धार्मिक महत्व

महेश नवमी का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान महेश अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। माहेश्वरी समाज के लोग इस दिन विशेष पूजा-अर्चना कर अपने परिवार, व्यवसाय और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक महेश नवमी का व्रत और पूजन करने से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाली महिलाएं भी इस दिन विशेष पूजा कर मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करती हैं। यह पर्व आस्था, परंपरा और भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।

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